Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1683

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
म꣣घो꣡नः꣢ स्म वृत्र꣣ह꣡त्ये꣢षु चोदय꣣ ये꣡ दद꣢꣯ति प्रि꣣या꣡ वसु꣢꣯ । त꣢व꣣ प्र꣡णी꣢ती हर्यश्व सू꣣रि꣢भि꣣र्वि꣡श्वा꣢ तरेम दुरि꣣ता꣢ ॥१६८३॥

म꣣घो꣡नः꣢ । स्म꣣ । वृत्रह꣡त्ये꣢षु । वृ꣣त्र । ह꣡त्ये꣢꣯षु । चो꣣दय । ये꣢ । द꣡द꣢꣯ति । प्रि꣣या꣢ । व꣡सु꣢꣯ । त꣡व꣢꣯ । प्र꣡णी꣢꣯ती । प्र । नी꣡ती । हर्यश्व । हरि । अश्व । सूरि꣡भिः꣢ । वि꣡श्वा꣢꣯ । त꣣रेम । दुरिता꣢ । दुः꣣ । इता꣢ ॥१६८३॥

Mantra without Swara
मघोनः स्म वृत्रहत्येषु चोदय ये ददति प्रिया वसु । तव प्रणीती हर्यश्व सूरिभिर्विश्वा तरेम दुरिता ॥

मघोनः । स्म । वृत्रहत्येषु । वृत्र । हत्येषु । चोदय । ये । ददति । प्रिया । वसु । तव । प्रणीती । प्र । नीती । हर्यश्व । हरि । अश्व । सूरिभिः । विश्वा । तरेम । दुरिता । दुः । इता ॥१६८३॥

Samveda - Mantra Number : 1683
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
उत्तम निवासवाला अथवा वशियों में श्रेष्ठ 'वशिष्ठ' प्रार्थना करता है कि हे (हर्यश्व) = [ हृ, अश्] सर्वदुःखहारिन् ! सर्वव्यापक प्रभो! आप (मघोनः) = उन धनियों को (ये) = जो (प्रिया वसु) = प्रिय धनों का (ददति) = दान देते हैं, (वृत्रहत्येषु) = वासनाओं के विनाश में (चोदय स्म) = अवश्य ही प्रेरित कीजिए । वस्तुतः धन कोई हेय व घृणित वस्तु नहीं है। हाँ, धन में आसक्त हो जानेवालों को धर्मज्ञान नहीं रहता। धन में असक्त को ही तो धर्म का ध्यान रहता है। (अर्थकामेष्वसक्तानां धर्मज्ञानं विधीयते,) अतः मनुष्य को धन तो कमाना चाहिए, परन्तु उसमें आसक्ति से ऊपर उठने के लिए सदा दान देते रहना चाहिए, दान का अर्थ 'देना' तो है ही, 'दान' का अर्थ 'खण्डन' [दो अवखण्डने] भी है। यह दान सचमुच वृत्रादि वासनाओं का खण्डन करनेवाला है ।

धनों को पात्रों में दान देनेवाले सदा उत्तम सङ्ग प्राप्त करते हैं और उन (सूरिभिः) = विद्वानों से ज्ञान प्राप्त करके हम हे प्रभो ! (तव प्रणीती) = तेरे प्रणयन में – आपके बतलाये हुए वेदमार्ग पर चलने से (विश्वा) = सब (दुरिता) = पापों को (तरेम) = तैर जाएँ।

संक्षेप में अभिप्राय यह है कि दान देने की वृत्ति से १. विद्वानों का सम्पर्क प्राप्त होता है २. उनके उपदेशों के श्रवण से 'वेदज्ञान' मिलता है – प्रभु से प्रतिपादित वेदमार्ग का पता लगता है, और ३. उसपर चलकर हमारे सब दुरित दूर हो जाते हैं ४. अब हम सचमुच उत्तम निवासवाले 'वसिष्ठ' बनते हैं ।
Essence
हम दान दें और वासनाओं का विनाश करें। प्रभु-प्रतिपादित मार्ग पर चलकर दुरितों से दूर हों ।
Subject
दान 'दान' है [ वृत्रों का विनाशक है ]