Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1677

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वालखिल्यम् (आयुः काण्वः) Chhand- बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
अ꣡स्ता꣢वि꣣ म꣡न्म꣢ पू꣣र्व्यं꣡ ब्रह्मेन्द्रा꣢꣯य वोचत । पू꣣र्वी꣢रृ꣣त꣡स्य꣢ बृह꣣ती꣡र꣢नूषत स्तो꣣तु꣢र्मे꣣धा꣡ अ꣢सृक्षत ॥१६७७॥

अ꣡स्ता꣢꣯वि । म꣡न्म꣢꣯ । पू꣣र्व्य꣢म् । ब्र꣡ह्म꣢꣯ । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । वो꣣चत । पूर्वीः꣢ । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । बृ꣣हतीः꣢ । अ꣣नूषत । स्तोतुः꣢ । मे꣣धाः꣢ । अ꣣सृक्षत ॥१६७७॥

Mantra without Swara
अस्तावि मन्म पूर्व्यं ब्रह्मेन्द्राय वोचत । पूर्वीरृतस्य बृहतीरनूषत स्तोतुर्मेधा असृक्षत ॥

अस्तावि । मन्म । पूर्व्यम् । ब्रह्म । इन्द्राय । वोचत । पूर्वीः । ऋतस्य । बृहतीः । अनूषत । स्तोतुः । मेधाः । असृक्षत ॥१६७७॥

Samveda - Mantra Number : 1677
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
स्तोत्र – १. (मन्म) = स्तोत्र (पूर्व्यम्) = [= उत्तम [ Excellent] हैं, इस प्रकार (अस्तावि) = स्तुति किये जाते हैं। स्तोत्रों की महिमा यह है कि इनके द्वारा मानव जीवन उत्तम बनता है—ये उसका पूरण करते हैं। स्तोत्रों के उच्चारण से तदनुरूप बनने की प्रेरणा मिलती है ।

किसके लिए ? – (ब्रह्म) = स्तोत्रों को (इन्द्राय) = उस निरतिशय ऐश्वर्यवाले प्रभु के लिए (वोचत) = उच्चारण करो । प्रभु के लिए स्तोत्रों का उच्चारण करना चाहिए। जिसकी स्तुति करेंगे वही तो हमारा लक्ष्य बनेगा । स्तुत्य के अनुसार ही अन्त में हमारा जीवन होगा । ब्रह्म की स्तुति करेंगे तो ब्रह्म-जैसे ही बनेंगे। ब्रह्म-जैसा बनना ही हमारा लक्ष्य होना चाहिए ।

कौन-से ? — उस प्रभु के लिए कौन-से स्तोत्रों का उच्चारण करें? इस प्रश्न का उत्तर इस प्रकार देते हैं कि (ऋतस्य) = सत्य की (पूर्वीः) = सनातन – अत्यन्त प्राचीन (बृहती:) = वृद्धि की कारणभूत

वेदवाणियाँ (अनूषत) = उच्चारण की जाती हैं, अर्थात् वेदमन्त्रों के द्वारा हम प्रभु का स्मरण करते हैं। ये वेदमन्त्र सृष्टि के आरम्भ में दिये जाने से 'पूर्वी: ' - सनातन हैं। इनमें उपदिष्ट बातें कार्यान्वित होने पर वृद्धि की कारणभूत होने से 'बृहती: ' हैं । इन वेदवाणियों का ही हमें उच्च स्वर से उच्चारण करना चाहिए।

(लाभ) = इस प्रकार वेदमन्त्रों से प्रभु के स्तोत्रों का उच्चारण करनवाला ‘स्तोता' कहलाता है। (स्तोतुः) = इस स्तोता की (मेधा:) = बुद्धियाँ (असृक्षत) = उस प्रभु के द्वारा सृष्ट की जाती हैं, अर्थात् स्तुति करने का सर्वमहान् लाभ यही है कि स्तोता को उत्तम बुद्धि प्राप्त होती है । इस उत्तम बुद्धि को प्राप्त करके उत्तम कर्मों के अन्दर प्रवृत्त होनेवाला यह स्तोता 'आयुः' कहलाता है [एति गच्छति]। प्रभुभक्त अकर्मण्य थोड़े ही बैठ सकता है ? कण-कण करके उन्नति करते चलने से यह ‘काण्व' है। 
Essence
स्तोत्र उत्तम हैं, स्तोत्रों का उच्चारण प्रभु के लिए करना, वेदमन्त्रों के द्वारा स्तुति करने पर स्तोता को बुद्धि प्राप्त होती है ।
Subject
स्तुति का लाभ