Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1675

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
मो꣡ षु त्वा꣢꣯ वा꣣घ꣡त꣢श्च꣣ ना꣢꣫रे अ꣣स्म꣡न्नि री꣢꣯रमन् । आ꣣रा꣡त्ता꣢द्वा सध꣣मा꣡दं꣢ न꣣ आ꣡ ग꣢ही꣣ह꣢ वा꣣ स꣡न्नु꣢꣯प श्रुधि ॥१६७५॥

मा꣢ । उ꣣ । सु꣢ । त्वा꣣ । वाघ꣡तः꣢ । च꣣ । न꣢ । आ꣣रे꣢ । अ꣣स्म꣢न् । नि । री꣣रमन् । आरा꣡त्ता꣢त् । वा꣣ । सधमा꣡द꣢म् । स꣣ध । मा꣡द꣢꣯म् । नः꣣ । आ꣢ । ग꣣हि । इह꣢ । वा꣣ । स꣢न् । उ꣡प꣢꣯ । श्रु꣢धि ॥१६७५॥

Mantra without Swara
मो षु त्वा वाघतश्च नारे अस्मन्नि रीरमन् । आरात्ताद्वा सधमादं न आ गहीह वा सन्नुप श्रुधि ॥

मा । उ । सु । त्वा । वाघतः । च । न । आरे । अस्मन् । नि । रीरमन् । आरात्तात् । वा । सधमादम् । सध । मादम् । नः । आ । गहि । इह । वा । सन् । उप । श्रुधि ॥१६७५॥

Samveda - Mantra Number : 1675
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
यह मन्त्र २८४ संख्या पर व्याख्यात है। सरलार्थ यह है -

हे प्रभो ! (वाघतः चन) = तेरा वहन करनेवाले विद्वान् भी (अस्मत् आरे) = हमसे दूर स्थान में (त्वा) = आपको (मा उ) = मत ही सु उत्तम प्रकार से (निरीरमन्) = प्रीणित करें। आपकी चर्चा के द्वारा जब विद्वान् आपकी आराधना करें तब हमारे समीप ही आपकी चर्चा करें। इस प्रकार हम उस वातावरण में रहें जहाँ आपकी चर्चा चलती हो ।

(वा) = अथवा (आरातात्) = इस दूर स्थान से भी (न:) = हमारे (सधमादम्) = आपके साथ मिलकर आनन्दित होने के उपासना स्थान में आगहि आ जाइए ।

और सबसे अच्छा तो यह है कि (इह वा) = यहाँ ही हमारे हृदयों में (सन्) = होते हुए (उपश्रुधि) = समीपता से हमें वेदवाणियों का श्रवण कराइए ।

विद्वानों की सभाओं में हम आपकी चर्चा सुनें, अपने उपासना-गृहों में आपका जपन करें और अन्त में हृदयस्थ आपसे वेदवाणियों का श्रवण करें। इस प्रकार आपके अत्यन्त सामीप्य का अनुभव करें। 
Essence
हम प्रभु के अत्यन्त समीप होने का प्रयत्न करें ।
 
Subject
समीपतम