Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1672

1875 Mantra
Devata- विष्णुः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त꣡द्विष्णोः꣢꣯ पर꣣मं꣢ प꣣द꣡ꣳ सदा꣢꣯ पश्यन्ति सू꣣र꣡यः꣢ । दि꣣वी꣢व꣣ च꣢क्षु꣣रा꣡त꣢तम् ॥१६७२॥

त꣢त् । वि꣡ष्णोः꣢꣯ । प꣣रम꣢म् । प꣣द꣢म् । स꣡दा꣢꣯ । प꣣श्यन्ति । सूर꣡यः꣢ । दि꣣वि꣢ । इ꣣व । च꣡क्षुः꣢꣯ । आ꣡त꣢꣯तम् । आ । त꣣तम् ॥१६७२॥

Mantra without Swara
तद्विष्णोः परमं पदꣳ सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षुराततम् ॥

तत् । विष्णोः । परमम् । पदम् । सदा । पश्यन्ति । सूरयः । दिवि । इव । चक्षुः । आततम् । आ । ततम् ॥१६७२॥

Samveda - Mantra Number : 1672
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
जब जीव प्रभु का शिष्य बनता है, अर्थात् उसके कर्मों को देखकर अपने कर्मों का निर्धारण करता है तब धीरे-धीरे पवित्र जीवनवाला बनता हुआ वह अपने ज्ञान को बढ़ाने में भी समर्थ होता है, अतएव यह सूरि:- विद्वान् कहलाता है । ये (सूरयः) = ज्ञानी लोग (विष्णोः) = व्यापक परमात्मा के (तत्) = उस (परमं पदम्) = उत्कृष्ट पद को (सदा पश्यन्ति) = सदा देखते हैं । (इव) = उसी प्रकार जैसेकि (दिवि) = द्युलोक में (आततम् चक्षुः) = इस व्यापक आँख को, अर्थात् सूर्य को हम सामान्य लोग देखते हैं। सूर्य हमें जितना स्पष्ट दीखता है उतना ही स्पष्ट ज्ञानी लोगों को परमात्मा का दर्शन होता है। हमें सूर्य के विषय में किसी प्रकार का सन्देह नहीं और ज्ञानियों को प्रभु की सत्ता के विषय में नाममात्र भी सन्देह नहीं । इस परमपद के दर्शन का साधन यही है कि हम प्रभु के कार्यों के अनुसार अपने कार्यों को बनाएँ ।
Essence
हम सूरि – ज्ञानी बनें और सूर्यवत् प्रभु के उस परमपद का दर्शन करें।
Subject
परमपद का दर्शन