Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1671

1875 Mantra
Devata- विष्णुः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वि꣢ष्णोः꣣ क꣡र्मा꣢णि पश्यत꣣ य꣡तो꣢ व्र꣣ता꣡नि꣢ पस्प꣣शे꣢ । इ꣡न्द्र꣢स्य꣣ यु꣢ज्यः꣣ स꣡खा꣢ ॥१६७१॥

वि꣡ष्णोः꣢꣯ । क꣡र्मा꣢꣯णि । प꣣श्यत । य꣡तः꣢꣯ । व्र꣣ता꣡नि꣢ । प꣣स्पशे । इ꣡न्द्र꣢꣯स्य । यु꣡ज्यः꣢꣯ । स꣡खा꣢꣯ । स । खा꣣ ॥१६७१॥

Mantra without Swara
विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे । इन्द्रस्य युज्यः सखा ॥

विष्णोः । कर्माणि । पश्यत । यतः । व्रतानि । पस्पशे । इन्द्रस्य । युज्यः । सखा । स । खा ॥१६७१॥

Samveda - Mantra Number : 1671
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रभु सर्वव्यापक हैं—सर्वव्यापक होने के नाते उनके कर्म भी व्यापकता को लिये हुए हैं—वे कर्म पूर्ण पवित्र हैं। इस व्यापकता के कारण प्रभु का नाम 'विष्णु' है । जीव को चाहिए कि कि उस प्रभु के कर्मों का विचार करे और अपने कर्त्तव्यों का निर्णय करे । (विष्णोः) = उस सर्वव्यापक प्रभु के (कर्माणि) = कर्मों को (पश्यत्) = देखो, (यतः) = जिनसे, अर्थात् जिनको देखकर (व्रतानि) = अपने कर्त्तव्यों को जीव (पस्पशे) = स्पष्टरूप से देखता है। प्रभु के सब कर्म पक्षपात व भेदभाव से शून्य और न्याय्य हैं—यह देखकर जीव को न्याय्यमार्ग पर ही चलने का निश्चय करना चाहिए।

परमात्मा ही (इन्द्रस्य) = जीवात्मा का उसे (युज्यः) = उत्तमोत्तम कर्मों में लगानेवाला, उत्तम कर्मों में प्रेरित करनेवाला (सखा) = मित्र है । प्रभु अपने उदाहरण से कर्मों की प्रेरणा दे रहे हैं - बशर्ते कि जीव उनका विचार करे । अन्तःकरण में स्थित हुए हुए वे प्रभु प्रेरणा दे रहे हैं - यदि हम उसे सुनें । प्रभु ही जीव के सच्चे सखा हैं । उस 'सविता देव' - दिव्य गुणों के पुञ्ज, प्रेरक प्रभु के कामों को देख व विचार कर और उससे दी गयी प्रेरणा को सुनकर जीव अपने व्रतों [duties] का सम्यक् निश्चय कर सकता है ।
Essence
वे प्रभु ही हमारे सच्चे मित्र हैं — उसके कर्म ही हमें हमारे कर्त्तव्यों का संकेत कर रहे हैं ।
Subject
इन्द्र का सदा सखा