Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 167

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- कुसीदी काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
आ꣡ तू न꣢꣯ इन्द्र क्षु꣣म꣡न्तं꣢ चि꣣त्रं꣢ ग्रा꣣भ꣡ꣳ सं गृ꣢꣯भाय । म꣣हाहस्ती꣡ दक्षि꣢꣯णेन ॥१६७॥

आ꣢ । तु । नः꣢ । इन्द्र । क्षुम꣡न्त꣢म् । चि꣣त्र꣢म् । ग्रा꣣भ꣢म् । सम् । गृ꣣भाय । महाहस्ती꣢ । म꣣हा । हस्ती꣢ । द꣡क्षि꣢꣯णेन ॥१६७॥

Mantra without Swara
आ तू न इन्द्र क्षुमन्तं चित्रं ग्राभꣳ सं गृभाय । महाहस्ती दक्षिणेन ॥

आ । तु । नः । इन्द्र । क्षुमन्तम् । चित्रम् । ग्राभम् । सम् । गृभाय । महाहस्ती । महा । हस्ती । दक्षिणेन ॥१६७॥

Samveda - Mantra Number : 167
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
पिछले मन्त्र में आत्मा के परमात्मा-तुल्य बनने का उल्लेख था । इस मन्त्र का ऋषि ‘कुसीदी' [कुस् संश्लेषणे] उस प्रभु से आलिङ्गन करनेवाला है। उस प्रभु से मेल करके उसके अनन्त आनन्द में भागी बनने में ही बुद्धिमत्ता है। इसीलिए यह कुसीदी ‘काण्व'=अत्यन्त मेधावी कहलाया है। यह 'कुसीदी काण्व' प्रभु से प्रार्थना करता है

हे (इन्द्र)=ज्ञान के परमैश्वर्यवाले प्रभो! (नः) = हमें (क्षुमन्तम्) = शब्दोंवाले, (चित्रम्) = उत्तम ज्ञान देनेवाले, (ग्राभम्)=ग्राह्य पदार्थ [posesion] अर्थात् वेदज्ञान को (तु) = निश्चय से (संगृभाय) = ग्रहण कराइए । ‘तु' शब्द की ठीक भावना 'पक्ष व्यावृत्ति' होती है। आप हमारी प्रवृत्ति को प्रकृति की ओर जाने व आसक्त होने से रोककर उस वेद - ज्ञान की ओर झुकाइए, जो हमें उत्तम ज्ञानधन का पोषण करनेवाली बनाएगी। 

आप (महा-हस्ती) = हैं। महान् गति - ज्ञानवाले हैं [ हन् गति - ज्ञान ] । हस्त शब्द बनता है। हन् का अर्थ हिंसा के अतिरिक्त ज्ञान भी है। उस प्रभु का ज्ञान महान्, अनन्त व पूजनीय है, अतः प्रभु 'महा-हस्ती' कहलाते हैं। हे प्रभो! आप (दक्षिणेन)=हमारी दक्षता =उन्नति के हेतु से हमें भी अपना महान् ज्ञान प्राप्त कराइए । इस महनीय ज्ञान को प्राप्त करके हम भी आपके सखा बनें। आपके साथ मेल करके हम इस मन्त्र के ऋषि ‘कुसीदी' बनें। अज्ञानियों से दूर रहते हुए भी आप ज्ञानियों के समीप ही हैं। हम भी आपके इस सामीप्य को प्राप्त करनेवाले बनें ।
Essence
प्रभुकृपा से हम अद्भुत सर्वज्ञानपूर्ण वैदिक सम्पत्ति के स्वामी बनें।
Subject
अद्भुत ज्ञानधन