Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1669

1875 Mantra
Devata- विष्णुः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣣दं꣢꣫ विष्णु꣣र्वि꣡ च꣢क्रमे त्रे꣣धा꣡ नि द꣢꣯धे प꣣द꣢म् । स꣡मू꣢ढमस्य पाꣳसु꣣ले꣢ ॥१६६९॥

इ꣣द꣢म् । वि꣡ष्णुः꣢꣯ । वि । च꣣क्रमे । त्रेधा꣢ । नि । द꣣धे । पद꣢म् । स꣡मू꣢꣯ढम् । सम् । ऊ꣣ढम् । अस्य । पाꣳसुले꣢ ॥१६६९॥

Mantra without Swara
इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा नि दधे पदम् । समूढमस्य पाꣳसुले ॥

इदम् । विष्णुः । वि । चक्रमे । त्रेधा । नि । दधे । पदम् । समूढम् । सम् । ऊढम् । अस्य । पाꣳसुले ॥१६६९॥

Samveda - Mantra Number : 1669
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
यह मन्त्र २२२ संख्या पर द्रष्टव्य है । सरलार्थ निम्न हैं—

(विष्णुः) = व्यापक उन्नति करनेवाला जीव (विचक्रमे) = पुरुषार्थ करता है, और (इदं पदं त्रेधा निदधे) = अपने इस चरण को तीन प्रकार से रखता है । यह केवल ज्ञान, केवल कर्म व केवल भक्ति को महत्त्व न देकर तीनों का ही अपने में समन्वय करने का प्रयत्न करता है। (पांसुले) = इस धूल भरे संसार में— अर्थात् जहाँ सार के स्थान में असार के ग्रहण की वृत्ति अधिक है – (अस्य) = इसने ही (सम्-ऊढम्) = अपने कर्त्तव्य भार का ठीक से वहन किया है । ज्ञान, कर्म व भक्ति तीनों के कणों को लेनेवाला यह ‘काण्व' सचमुच मेधातिथि है – बुद्धिमत्ता से चलनेवाला है।
Essence
हम अपने जीवनों में ज्ञान, कर्म व भक्ति तीनों का समन्वय करें।
Subject
‘त्रे – धा' नकि 'एक- — धा'