Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1667

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
न꣢ घा꣣ व꣢सु꣣र्नि꣡ य꣢मते दा꣣नं꣡ वाज꣢꣯स्य꣣ गो꣡म꣢तः । य꣢त्सी꣣मु꣢प꣣श्र꣢व꣣द्गि꣡रः꣢ ॥१६६७॥

न꣢ । घ꣣ । व꣡सुः꣢ । नि । य꣣मते । दान꣢म् । वा꣡ज꣢꣯स्य । गो꣡म꣢꣯तः । यत् । सी꣣म् । उ꣡प꣢꣯ । श्र꣡व꣢꣯त् । गि꣡रः꣢꣯ ॥१६६७॥

Mantra without Swara
न घा वसुर्नि यमते दानं वाजस्य गोमतः । यत्सीमुपश्रवद्गिरः ॥

न । घ । वसुः । नि । यमते । दानम् । वाजस्य । गोमतः । यत् । सीम् । उप । श्रवत् । गिरः ॥१६६७॥

Samveda - Mantra Number : 1667
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
‘वासयति–वसति वासयति वा इति वसुः' - सबको अपने अन्दर निवास देने के कारण तथा सबमें निवास करने के कारण वे प्रभु 'वसु' हैं । ये (वसुः) = सबको बसानेवाले प्रभु (घ) = निश्चय से (गोमतः) = वेदवाणियोंवाले, अर्थात् ज्ञान से युक्त (वाजाय) = शक्ति के (दानम्) = दान को (नियमते) = सीमित (न) = नहीं करते, अ असीम ज्ञान व शक्ति देते हैं, परन्तु कब ? (यत्) = जब (सीम्) = निश्चय से जीव (गिर:) = प्रभु की वाणियों को (उपश्रवत्) = समीपता से सुनता है। जैसे संसार में पुत्र जब माता की बात को ध्यान से सुनता है तब वह उनका प्रिय बनता है, उसी प्रकार जीव भी जब प्रभु की बात सुनता है तब प्रभु का प्रिय होता है। जब प्रभु को जीव प्रीणित करता है तब प्रभु उसे प्रशस्तेन्द्रियों तथा प्रशस्त ज्ञानवाला बल प्राप्त कराते हैं । [गाव: १. इन्द्रियाणि २. वेदवाचः]।

जीव का कर्त्तव्य है कि वह प्रभु की वाणी को सुने । जब जीव प्रभु की वाणी को सुनता है तब १. इसकी इन्द्रियाँ प्रशस्त होती हैं, २. उसका ज्ञान बढ़ता है तथा ३. वह शक्ति सम्पन्न बनता है। ज्ञान का सम्पादन करनेवाला यह 'बार्हस्पत्य' कहलाता है । शक्ति प्राप्त करके यह नीरोग व सुखी जीवनवाला 'शंयु' होता है । यह 'शंयु बार्हस्पत्य' प्रभु की आज्ञा में चलता है और परिणामत: असीम शक्ति व ज्ञान का लाभ करता है । 
Essence
हम प्रभु के निर्देशों को ध्यान से सुननेवाले हों।
Subject
शान्ति व ज्ञान का असीम दान