Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1666

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त꣡द्वो꣢ गाय सु꣣ते꣡ सचा꣢꣯ पुरुहू꣣ता꣢य꣣ स꣡त्व꣢ने । शं꣢꣫ यद्गवे꣣ न꣢ शा꣣कि꣡ने꣢ ॥१६६६॥

त꣢त् । वः꣣ । गाय । सुते꣢ । स꣡चा꣢꣯ । पु꣣रुहूता꣡य꣢ । पु꣣रु । हूता꣡य꣢ । स꣡त्व꣢꣯ने । शम् । यत् । ग꣡वे꣢꣯ । न । शा꣣कि꣡ने꣢ ॥१६६६॥

Mantra without Swara
तद्वो गाय सुते सचा पुरुहूताय सत्वने । शं यद्गवे न शाकिने ॥

तत् । वः । गाय । सुते । सचा । पुरुहूताय । पुरु । हूताय । सत्वने । शम् । यत् । गवे । न । शाकिने ॥१६६६॥

Samveda - Mantra Number : 1666
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रस्तुत मन्त्र की व्याख्या संख्या ११५ पर द्रष्टव्य है । सरलार्थ इस प्रकार है (वः पुरुहूताय) = जिसका आह्वान तुम्हारा पालन व पूरण करनेवाला है— उस (सत्वने) = कामादि शत्रुओं का शातन–विनाश करनेवाले के लिए तथा (गवे न) = गौ के समान निर्दोष के तथा शाकिने-शक्ति के मद में निर्बलों पर अत्याचारी के भी (शम्) = कल्याण करनेवाले प्रभु के लिए (सुते) = इस उत्पन्न जगत् में अथवा उत्पादन के निमित्त (सचा) = मिलकर (तत्)-उस स्तोत्र का (गाय) = गायन कर। यह गायन ही तेरी सच्ची शान्ति का साधन होगा और तू इस मन्त्र का ऋषि ‘शंयु' बन पाएगा। 
Essence
हम प्रभु का गायन करें और सच्ची शान्ति प्राप्त करें ।
Subject
प्रभु का गायन व शान्ति