Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1663

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ज꣡रा꣢बोध꣣ त꣡द्वि꣢विड्ढि वि꣣शे꣡वि꣢शे य꣣ज्ञि꣡या꣢य । स्तो꣡म꣢ꣳ रु꣣द्रा꣡य꣢ दृशी꣣क꣢म् ॥१६६३॥

ज꣡रा꣢꣯बोध । ज꣡रा꣢꣯ । बो꣣ध । त꣢त् । वि꣣विड्ढि । विशे꣡वि꣢शे । वि꣣शे꣢ । वि꣣शे । यज्ञि꣡या꣢य । स्तो꣡म꣢꣯म् । रु꣢द्रा꣡य꣢ । दृ꣣शीक꣢म् ॥१६६३॥

Mantra without Swara
जराबोध तद्विविड्ढि विशेविशे यज्ञियाय । स्तोमꣳ रुद्राय दृशीकम् ॥

जराबोध । जरा । बोध । तत् । विविड्ढि । विशेविशे । विशे । विशे । यज्ञियाय । स्तोमम् । रुद्राय । दृशीकम् ॥१६६३॥

Samveda - Mantra Number : 1663
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
यह मन्त्र संख्या १५ पर द्रष्टव्य है। सरलार्थ यह है—(जराबोध) = हे बुढ़ापे में चेतनेवाले जीव! (विशेविशे यज्ञियाय) = प्रत्येक प्राणी के साथ सम्पर्क रखनेवाले (रुद्राय) =(रुत्+र) उपदेश देनेवाले प्रभु के लिए (तत्)=उस (दृशीकं स्तोमम्) = आँखों से दीखनेवाली स्तुति को (विविड्ढि) = व्याप्त कर।
सामान्यतः मनुष्य वाणी से ही प्रभु के स्तोत्रों को बोलता रहता है—यह श्रव्यभक्ति है। सब प्राणियों के हित में लगना ही प्रभु की दृश्य भक्ति है—यही प्रभु को प्रीणित कर सकती है। वास्तविक सुख का निर्माण तो यही भक्त कर पाता है, अतः ‘शुनःशेप’ (शुनम्—सुख, शेप=ह्लश द्वड्डद्मद्ग) कहलाता है।
Subject
दृश्य भक्ति न कि श्रव्य