Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1662

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः सुकक्षो वा आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣡रं꣢ त इन्द्र कु꣣क्ष꣢ये꣣ सो꣡मो꣢ भवतु वृत्रहन् । अ꣢रं꣣ धा꣡म꣢भ्य꣣ इ꣡न्द꣢वः ॥१६६२॥

अ꣡र꣢꣯म् । ते꣣ । इन्द्र । कु꣡क्षये꣢ । सो꣡मः꣢꣯ । भ꣣वतु । वृत्रहन् । वृत्र । हन् । अ꣡र꣢꣯म् । धा꣡म꣢꣯भ्यः । इ꣡न्द꣢꣯वः ॥१६६२॥

Mantra without Swara
अरं त इन्द्र कुक्षये सोमो भवतु वृत्रहन् । अरं धामभ्य इन्दवः ॥

अरम् । ते । इन्द्र । कुक्षये । सोमः । भवतु । वृत्रहन् । वृत्र । हन् । अरम् । धामभ्यः । इन्दवः ॥१६६२॥

Samveda - Mantra Number : 1662
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (इन्द्र) = इन्द्रियों के अधिष्ठाता जीव ! हे (वृत्रहन्) = ज्ञान के आवरणभूत वृत्र, अर्थात् वासनाओं को नष्ट करनेवाले आत्मन् ! यह (ते) = तेरा (सोमः) = वीर्य [Semen] कुक्षये [कु कुत्सित = खराबी] सब बुराइयों के क्षय के निमित्त (अरं भवतु) = समर्थ हो । ये (इन्दवः) = सोमकण (धामभ्यः) = प्रकाश [Light,। Lustre] व प्रताप [Power] के लिए - अर्थात् ब्रह्म व क्षत्र विकास के लिए (अरम्) = समर्थ हैं जीवात्मा को इन्द्र व वृत्रहन् बनना है— उसका लक्ष्य जितन्द्रिय होना तथा वासनाओं का विनाश कर डालना होना चाहिए। यह लक्ष्य होने पर वह सोम की रक्षा के लिए विशेषरूप से प्रवृत्त होता है । यह सोमरक्षा ही 'ब्रह्मचर्य' है । यह उसे ब्रह्म -बड़े की ओर चर्-ले-जाती है। इससे १. उसकी सब बुराइयाँ दूर हो जाती हैं [कु – क्षय] तथा २. उसे प्रकाश व प्रताप की [धामा] प्राप्ति होती है। दूसरे शब्दों 'उसके ब्रह्म व क्षत्र का विकास होता है। जहाँ उसका ज्ञान बढ़ता है वहाँ उसकी शक्ति की भी वृद्धि होती है ।

सोम को अपने जीवन का आधार बनाने से यह बुराइयों को दूर कर सका तथा शक्ति व ज्ञान को प्राप्त करनेवाला बना। एवं, यह सोम उसके रक्षण के लिए कितनी सुन्दर वस्तु प्रमाणित हुई। क्या यह सचमुच सु-कक्ष - उत्तम शरण- [Shelter] - वाला नहीं ? यह जहाँ सुकक्ष है वहाँ ज्ञान की वृद्धि करनेवाला ‘ श्रुतकक्ष' है। 
Essence
सुरक्षित सोम मुझे पवित्रता, प्रकाश व प्रताप की प्राप्ति करानेवाला हो ।
Subject
प्रकाश व प्रताप