Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1661

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः सुकक्षो वा आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वि꣣व्य꣡क्थ꣢ महि꣣ना꣡ वृ꣢षन्भ꣣क्ष꣡ꣳ सोम꣢꣯स्य जागृवे । य꣡ इ꣢न्द्र ज꣣ठ꣡रे꣢षु ते ॥१६६१॥

वि꣣व्य꣡क्थ꣢ । म꣣हिना꣢ । वृ꣣षन् । भक्ष꣢म् । सो꣡म꣢꣯स्य । जा꣣गृवे । यः꣢ । इ꣣न्द्र । जठ꣡रे꣢षु । ते꣣ ॥१६६१॥

Mantra without Swara
विव्यक्थ महिना वृषन्भक्षꣳ सोमस्य जागृवे । य इन्द्र जठरेषु ते ॥

विव्यक्थ । महिना । वृषन् । भक्षम् । सोमस्य । जागृवे । यः । इन्द्र । जठरेषु । ते ॥१६६१॥

Samveda - Mantra Number : 1661
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (वृषन्) = शक्तिशालिन् ! (जागृवे) = सदा जागरणशील ! (इन्द्र) = इन्द्रियों के अधिष्ठाता जीव! तू (महिना) = महिमा के हेतु से (सोमस्य भक्षम्) = इस सोम के भोजन को (यः) = जो (ते) = तेरे (जठरेषु) = उदर में ही उत्पन्न होता है, उसे (विव्यक्थ) = अपने अन्दर ही व्याप्त कर ।

भोजन का अन्तिम परिणाम जठर= उदर में वीर्य के रूप में होता है। वहाँ रस-रुधिरादि के क्रम से इसका निर्माण होता है। इसे जीव ने अपने अन्दर ही व्याप्त करना है। यह वीर्य ही उसे महिमा को प्राप्त करानेवाला होगा। इस विषय में इसे सदा जागरित – सावधान रहना है, क्योंकि तनिक भी

प्रमाद हुआ, और वासनाओं का शिकार होकर हम इसे गँवा बैठेंगे। इसके शरीर में व्याप्त होने पर ही हम शक्तिशाली बनेंगे ।

(लाभ) = जो सोमपान करता है वह १. शक्तिशाली बनता है [वृषन्] और २. महिमा को प्राप्त करता है ।

(साधन) = सोमपान कर वह सकता है १. जो सदा सावधान है [जागृवि] तथा २. जितेन्द्रिय बनता है [इन्द्र]। 

प्रभु ने शरीर में रसों का रस निकालने की व्यवस्था करके इसका निर्माण किया है । इसे शरीर में ही व्याप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। यह वीर्य ही हमें रोगादि से बचानेवाला उत्तम 'कक्ष' = [shelter] है। इसको अपनानेवाला 'सुकक्ष' है।
Essence
हम वीर्यरक्षा द्वारा महिमाशाली बनें।
Subject
वीर्यरक्षा से महत्त्व की प्राप्ति