Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1660

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः सुकक्षो वा आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣡ त्वा꣢ विश꣣न्त्वि꣡न्द꣢वः समु꣣द्र꣡मि꣢व꣣ सि꣡न्ध꣢वः । न꣢꣫ त्वामि꣣न्द्रा꣡ति꣢ रिच्यते ॥१६६०॥

आ꣢ । त्वा꣣ । विशन्तु । इ꣡न्द꣢꣯वः । स꣣मुद्र꣢म् । स꣣म् । उद्र꣢म् । इ꣢व । सि꣡न्ध꣢꣯वः । न । त्वाम् । इ꣣न्द्र । अ꣡ति꣢꣯ । रि꣣च्यते ॥१६६०॥

Mantra without Swara
आ त्वा विशन्त्विन्दवः समुद्रमिव सिन्धवः । न त्वामिन्द्राति रिच्यते ॥

आ । त्वा । विशन्तु । इन्दवः । समुद्रम् । सम् । उद्रम् । इव । सिन्धवः । न । त्वाम् । इन्द्र । अति । रिच्यते ॥१६६०॥

Samveda - Mantra Number : 1660
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
यह मन्त्र १९७ संख्या पर व्याख्यात है। सरलार्थ यह है - प्रभु श्रुतकक्ष से कहते हैं कि (त्वा) = तुझमें (इन्दव:) = सोम इस प्रकार (आविशन्तु) = प्रवेश करें (इव) = जैसे (सिन्धवः) = नदियाँ (समुद्रम्) = समुद्र में । नदियाँ समुद्र से बाहर थोड़े ही जाती हैं— तुझसे भी सोमकण बाहर न जाएँ। जब ऐसा होता है तब हे (इन्द्र) = इन्द्रियों के अधिष्ठता जीव (त्वाम् न अतिरिच्यते) = तुझसे कोई अधिक नहीं होता है, अर्थात् तू शिखर पर पहुँच जाता है । 
Essence
शिखर पर पहुँचने के लिए मैं भी ' श्रुतकक्ष' = ज्ञान को शरण बनानेवाला होऊँ ।
Subject
सबसे महान्