Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1657

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चाङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प꣡न्यं꣢पन्य꣣मि꣡त्सो꣢तार꣣ आ꣡ धा꣢वत꣣ म꣡द्या꣢य । सो꣡मं꣢ वी꣣रा꣢य꣣ शू꣡रा꣢य ॥१६५७॥

प꣡न्यं꣢꣯पन्यम् । प꣡न्य꣢꣯म् । प꣣न्यम् । इ꣢त् । सो꣣तारः । आ꣢ । धा꣣वत । म꣡द्या꣢꣯य । सो꣡म꣢꣯म् । वी꣣रा꣡य꣢ । शू꣡रा꣢꣯य ॥१६५७॥

Mantra without Swara
पन्यंपन्यमित्सोतार आ धावत मद्याय । सोमं वीराय शूराय ॥

पन्यंपन्यम् । पन्यम् । पन्यम् । इत् । सोतारः । आ । धावत । मद्याय । सोमम् । वीराय । शूराय ॥१६५७॥

Samveda - Mantra Number : 1657
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
यह मन्त्र १२३ संख्या पर व्याख्यात है । मन्त्र का सरलार्थ निम्न है = (सोतार:) = हे प्रभु के उपासको ! (इत्) = निश्चय से (पन्यंपन्यम्) = स्तुत्य और स्तुत्य ही, अर्थात् सात्त्विक भोजनों का ही ग्रहण करो और इस प्रकार (सोमं आ धावत) = सोम को सर्वथा शुद्ध रक्खो । यह सुरक्षित सोम (मद्याय) = हर्ष के लिए होगा, (वीराय) = वीरत्व [Virtue] व गुणों के उत्पादन के लिए होगा तथा (शूराय) = [शृ हिंसायाम्] सब रोगों का शीर्ण करनेवाला होगा। 
Essence
सोमरक्षा के लिए सात्त्विक भोजन आवश्यक है ।
Subject
सात्त्विक भोजन