Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1654

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhand- एकपदा पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
सु꣣म꣢न्मा꣣ व꣢स्वी꣣ र꣡न्ती꣢ सू꣣न꣡री꣢ ॥१६५४

सु꣣म꣡न्मा꣢ । सु꣣ । म꣡न्मा꣢꣯ । व꣡स्वी꣢꣯ । र꣡न्ती꣢꣯ । सू꣣न꣡री꣢ । सु꣣ । न꣡री꣢꣯ ॥१६५४॥

Mantra without Swara
सुमन्मा वस्वी रन्ती सूनरी ॥१६५४

सुमन्मा । सु । मन्मा । वस्वी । रन्ती । सूनरी । सु । नरी ॥१६५४॥

Samveda - Mantra Number : 1654
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 17; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत तृच का ऋषि ‘वत्स' जिस वेदवाणी का उच्चारण करता है, वह वेदवाणी चतुष्टयी है । यह चतुष्टयी वेदवाणी इसके जीवन को सुखी बनाती है। अपने जीवन को सुख-सम्पन्न बनाकर यह सचमुच ‘शुन:शेप' बन जाता है। प्रस्तुत तृच का यही ऋषि है । यह वेदवाणी इसके लिए

१. (सुमन्मा) = उत्तम [सु] विज्ञानों- [मन्म] - वाली है। उत्तम विज्ञानों के द्वारा ही मनुष्य प्राकृतिक शरीर की सब भौतिक आवश्यकताओं को पूर्ण कर पाएगा।

२. (वस्वी) = यह वेदवाणी सब वसुओंवाली है । निवास के लिए, जीवन के लिए आवश्यक वस्तुएँ‘वसु’ हैं। इन वसुओं को यह देनेवाली है। ‘आयुः, प्राणं, प्रजां, पशुं, कीर्तिं, द्रविणं, ब्रह्मवर्चसम्' ये सब वसु हैं। वेदों में प्रतिपादित साधनों को क्रियान्वित करने पर हमें दीर्घायुष्य, प्राणशक्ति, उत्तम प्रजा व सन्तान, उत्तमपशु, यश, धन व ज्ञान सभी कुछ प्राप्त होगा ।

३. (रन्ती) = यह वेदवाणी हमें प्रभु में रमण करानेवाली है। वेदों का अध्यात्म उपदेश हमें‘आत्माराम' बनानेवाला है।

४. (सूनरी) = इस प्रकार यह वेदवाणी हमें सदा उत्तम मार्ग से ले-चलनेवाली है। [सु-नृ नये] उत्तम मार्ग से चलते हुए हमारा जीवन यथार्थ में सुखमय बनता है और हम मन्त्र के ऋषि ‘शुन: शेप' होते हैं ।
Essence
वेदवाणी हमें उत्तममार्ग से चलाकर विज्ञान और वसु प्राप्त कराके अन्त में प्रभु में रमण कराती है।
Subject
चतुष्टयी वेदवाणी