Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1653

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वत्सः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ओ꣢ज꣣स्त꣡द꣢स्य तित्विष उ꣣भे꣢꣫ यत्स꣣म꣡व꣢र्तयत् । इ꣢न्द्र꣣श्च꣡र्मे꣢व꣣ रो꣡द꣢सी ॥१६५३॥

ओ꣡जः꣢꣯ । तत् । अ꣣स्य । तित्विषे । उभे꣡इति꣢ । यत् । स꣣म꣡व꣢र्तयत् । स꣣म् । अ꣡व꣢꣯र्तयत् । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । च꣡र्म꣢꣯ । इ꣢व । रो꣡द꣢꣯सी꣢इ꣡ति꣢ ॥१६५३॥

Mantra without Swara
ओजस्तदस्य तित्विष उभे यत्समवर्तयत् । इन्द्रश्चर्मेव रोदसी ॥

ओजः । तत् । अस्य । तित्विषे । उभेइति । यत् । समवर्तयत् । सम् । अवर्तयत् । इन्द्रः । चर्म । इव । रोदसीइति ॥१६५३॥

Samveda - Mantra Number : 1653
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 17; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(अस्य ओजः तत् तित्विषे) = इस वत्स का ओज तो तभी चमकता है (यत्) = जब (इन्द्रः) = यह जीवात्मा (चर्म इव) = चर्म की भाँति (उभे रोदसी) = दोनों द्युलोक और पृथिवीलोक को (समवर्तयत्) = धारण कर लेता है [to wrap up]।

‘द्युलोक' मस्तिक का प्रतीक है और 'पृथिवीलोक' शरीर का । 'इन्द्र' जीवात्मा है, अर्थात् केवल शारीरिक विकास से जीवात्मा की पूरी शोभा नहीं होती और केवल मस्तिष्क के विकास से भी यह शोभामय जीवनवाला नहीं होता। जैसे चर्म– त्वचा में लिपटा हुआ शरीर सुरक्षित होता है उसी प्रकार ज्ञान और शक्ति में - ब्रह्म और क्षत्र में लिपटा हुआ इन्द्र शोभायमान और ओजस्वी होता है।
Essence
हम ज्ञान और शक्ति को धारण करके ओजस्वी बनें और प्रभु के प्रिय हों । 
 
Subject
ओजस्वी कौन ?