Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1651

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वत्सः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स꣡म꣢स्य म꣣न्य꣢वे꣣ वि꣢शो꣣ वि꣡श्वा꣢ नमन्त कृ꣣ष्ट꣡यः꣢ । स꣣मुद्रा꣡ये꣢व꣣ सि꣡न्ध꣢वः ॥१६५१॥

स꣢म् । अ꣣स्य । मन्य꣡वे꣢ । वि꣡शः꣢꣯ । वि꣡श्वाः꣢꣯ । न꣣मन्त । कृष्ट꣡यः꣢ । स꣣मुद्रा꣡य꣢ । स꣣म् । उद्रा꣡य꣢ । इ꣣व । सि꣡न्ध꣢꣯वः ॥१६५१॥

Mantra without Swara
समस्य मन्यवे विशो विश्वा नमन्त कृष्टयः । समुद्रायेव सिन्धवः ॥

सम् । अस्य । मन्यवे । विशः । विश्वाः । नमन्त । कृष्टयः । समुद्राय । सम् । उद्राय । इव । सिन्धवः ॥१६५१॥

Samveda - Mantra Number : 1651
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 17; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रस्तुत मन्त्र की व्याख्या संख्या १३७ पर इस रूप में है—

(इव) = जैसे (सिन्धवः) = बहनेवाली नदियाँ (समुद्राय) = समुद्र के लिए [संनमन्ति] = झुकती हैं, उसी प्रकार (विश्वाः) = इस संसार के अन्दर प्रविष्ट हुए हुए और अब प्रभु की गोद में प्रवेश की इच्छावाले (कृष्टयः) = हृदयस्थली से वासनारूप घासफूस को उखाड़ देने की कामनावाले (विश:) = प्रजाजन (अस्य) = इस प्रभु के (मन्यवे) = ज्ञान के लिए (संनमन्त) = झुकते हैं, अर्थात् प्रभु से दिये गये वेदज्ञान के लिए प्रयत्नशील होते हैं । 
 
Essence
ज्ञान प्राप्त करना हमारे लिए स्वाभाविक हो जाए तभी हम प्रभु के प्रिय बन पाएँगे ।
Subject
हम प्रभु के ‘वत्स'=प्रिय बनें