Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1650

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विरूप आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
मा꣡ नो꣢ अग्ने महाध꣣ने꣡ परा꣢꣯ वर्ग्भार꣣भृ꣡द्य꣢था । सं꣣व꣢र्ग꣣ꣳ स꣢ꣳ र꣣यिं꣡ ज꣢य ॥१६५०॥

मा꣢ । नः꣣ । अग्ने । महाधने꣢ । म꣣हा । धने꣢ । प꣡रा꣢꣯ । व꣣र्क् । भारभृ꣢त् । भा꣣र । भृ꣢त् । य꣣था । संव꣡र्ग꣢म् । स꣣म् । व꣡र्ग꣢꣯म् । सम् । र꣣यि꣢म् । ज꣢य ॥१६५०॥

Mantra without Swara
मा नो अग्ने महाधने परा वर्ग्भारभृद्यथा । संवर्गꣳ सꣳ रयिं जय ॥

मा । नः । अग्ने । महाधने । महा । धने । परा । वर्क् । भारभृत् । भार । भृत् । यथा । संवर्गम् । सम् । वर्गम् । सम् । रयिम् । जय ॥१६५०॥

Samveda - Mantra Number : 1650
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 17; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (अग्ने) = अग्रेणी प्रभो ! (नः) = हमें इस दिये हुए (महाधने) = महाधन – विशालधन राशि के लिए (यथा भारभृत्) = एक कुली की भाँति बोझा ढोनेवाले के समान (मा परावर्क्) = मत छोड़ दीजिए । हम धन का बोझा ढोनेवाले ही न बने रहें । हम अपने जीवनकाल में कृपणता को छोड़कर उदारता से ज्ञानान्वेषण [research] के कार्यों में धन का विनियोग करते हुए अपने बोझ को सदा हलका करते रहें । अन्यथा बोझ के नीचे दबकर हमारी शकल [मुखाकृति] ही विकृत हो जाएगी । हम 'विहीनरूप' वाले ‘विरूप’ बन जाएँगे। हमारी तो इच्छा है कि हम 'विशिष्टरूप' वाले विरूप, अर्थात् तेजस्वी बनें। = उल्लिखित कामनावाले विरूप से प्रभु कहते हैं कि तू (वर्गम्) = वर्जनीय शत्रुवर्ग को (संजय) = अच्छी प्रकार जीत । काम-क्रोधादि पर विजय पाने का यत्न कर और रयिं संजय - इस धन पर भी तू विजय प्राप्त करनेवाला बन । जब धन तुझे जीत लेता है तभी तो तू इसका ‘भारभृत्' बन जाता है । यह तुझपर सवार हो जाता है। जब लोभ को जीतकर तू धन का स्वामी बनेगा तब तू अवश्य ज्ञानान्वेषण में इसका विनियोग करेगा, वस्तुतः उसी दिन तू तेजस्वी वा 'विरूप’ बनेगा। 
Essence
हम धनों का बोझ ही न ढोते रह जाएँ, हम धन का विनियोग ज्ञानान्वेषण में करें ।
Subject
कुली ही न बन जाएँ