Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1648

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विरूप आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
न꣡म꣢स्ते अग्न꣣ ओ꣡ज꣢से गृ꣣ण꣡न्ति꣢ देव कृ꣣ष्ट꣡यः꣢ । अ꣡मै꣢र꣣मि꣡त्र꣢मर्दय ॥१६४८॥

न꣡मः꣢꣯ । ते꣣ । अग्ने । ओ꣡ज꣢꣯से । गृ꣣ण꣡न्ति꣢ । दे꣣व । कृष्ट꣡यः꣢ । अ꣡मैः꣢꣯ । अ꣣मि꣡त्र꣢म् । अ꣣ । मि꣡त्र꣢꣯म् । अ꣣र्द꣡य ॥१६४८॥

Mantra without Swara
नमस्ते अग्न ओजसे गृणन्ति देव कृष्टयः । अमैरमित्रमर्दय ॥

नमः । ते । अग्ने । ओजसे । गृणन्ति । देव । कृष्टयः । अमैः । अमित्रम् । अ । मित्रम् । अर्दय ॥१६४८॥

Samveda - Mantra Number : 1648
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 17; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
अग्न प्रस्तुत मन्त्र संख्या ११ पर इस प्रकार व्याख्यात हुआ है -
हे (अग्ने) = अग्रेणी प्रभो ! ते (ओजसे) = आपके ओज के लिए (नमः) = हम प्रणाम करते हैं । हे (देव) = सब दिव्य गुणों के पुञ्ज प्रभो ! (कृष्टयः) = कृ आदि निर्माणात्मक कार्यों को करनेवाले ही वस्तुतः (गृणन्ति) = आपका स्तवन करते हैं । (अमैः) = शक्तियों से (अमित्रम्) = शत्रु को–अस्नेह आदि वृत्तियों को (अर्दय) = पीड़ित करके दूर भगा दीजिए।
Essence
ओजस्वी प्रभु का स्मरण हमें भी ओजस्वी बनने की प्रेरणा दे । ओजस्वी बनकर हम सब कामादि अध्यात्म शत्रुओं का संहार कर दें ।
Subject
प्रभु के ओज के प्रति नमन