Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1639

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोषूक्त्यश्वसूक्तिनौ काण्वायनौ Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य꣣ज्ञ꣡ इन्द्र꣢꣯मवर्धय꣣द्य꣢꣯द्भूमिं꣣ व्य꣡व꣢र्तयत् । च꣣क्राण꣡ ओ꣢प꣣शं꣢ दि꣣वि꣢ ॥१६३९॥

य꣣ज्ञः꣢ । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । अ꣣वर्धयत् । य꣢त् । भू꣡मि꣢꣯म् । व्य꣡व꣢꣯र्तयत् । वि । अ꣡व꣢꣯र्तयत् । च꣣क्राणः꣢ । ओ꣣पश꣢म् । ओ꣣प । श꣢म् । दि꣣वि꣢ ॥१६३९॥

Mantra without Swara
यज्ञ इन्द्रमवर्धयद्यद्भूमिं व्यवर्तयत् । चक्राण ओपशं दिवि ॥

यज्ञः । इन्द्रम् । अवर्धयत् । यत् । भूमिम् । व्यवर्तयत् । वि । अवर्तयत् । चक्राणः । ओपशम् । ओप । शम् । दिवि ॥१६३९॥

Samveda - Mantra Number : 1639
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 17; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रस्तुत मन्त्र की व्याख्या संख्या १२१ पर इस प्रकार है (यज्ञः) = यज्ञ की भावना ने (इन्द्रम्) = आत्मा को (अवर्धयत्) = बढ़ाया है । (यत्) = इसीलिए तो (भूमिं व्यवर्तयत्) = इन्द्र ने यज्ञ के लिए सारी पार्थिव सम्पत्ति – सारी थैली को ही उलटा दिया है । इस यज्ञिय भावना के परिणामरूप यह इन्द्र (दिवि) = मस्तिष्क में (ओपशम्) = मस्तक के ज्ञानरूप आभरण को (चक्राणः) = बनानेवाला हुआ है । 
Essence
यज्ञ से सब प्रकार का वर्धन होता है और मस्तिष्क ज्ञान से अलंकृत होता है |
 
Subject
'यज्ञ' ही फूलने-फलने का साधन है