Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1632

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- रेभसूनू काश्यपौ Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
त꣡म꣢स्य मर्जयामसि꣣ म꣢दो꣣ य꣡ इ꣢न्द्र꣣पा꣡त꣢मः । यं꣡ गाव꣢꣯ आ꣣स꣡भि꣢र्द꣣धुः꣢ पु꣣रा꣢ नू꣣नं꣡ च꣢ सू꣣र꣡यः꣢ ॥१६३२॥

तम् । अ꣣स्य । मर्जयामसि । म꣡दः꣢꣯ । यः । इ꣣न्द्रपा꣡त꣢मः । इ꣣न्द्र । पा꣡त꣢꣯मः । यम् । गा꣡वः꣢꣯ । आ꣣स꣡भिः꣢ । द꣣धुः꣢ । पु꣣रा꣢ । नू꣣न꣢म् । च꣣ । सूर꣡यः꣢ ॥१६३२॥

Mantra without Swara
तमस्य मर्जयामसि मदो य इन्द्रपातमः । यं गाव आसभिर्दधुः पुरा नूनं च सूरयः ॥

तम् । अस्य । मर्जयामसि । मदः । यः । इन्द्रपातमः । इन्द्र । पातमः । यम् । गावः । आसभिः । दधुः । पुरा । नूनम् । च । सूरयः ॥१६३२॥

Samveda - Mantra Number : 1632
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 17; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
‘सोम' शरीर में सर्वोत्तम रक्षक है । यह शरीर को नीरोग रखता है, मन को निर्मल करता है और बुद्धि को तीव्र बनाता है । वस्तुतः यह जीवन का आधार है । इसके अभाव में तो मृत्यु ही है,
इसीलिए इसे यहाँ ‘इन्द्र-पात-मः'=जीवात्मा का सर्वोत्तम रक्षक कहा गया है। यह जीवन में उल्लास लानेवाला है, अत: इसे मदः – हर्षजनक कहा है। हम (अस्य) = इस जीव के (तम्) = उस सोम को (मर्जयामसि) = शुद्ध करते हैं (यः) = जो (मदः) = उल्लास को देनेवाला तथा (इन्द्रपातमः) = जीवात्मा का सर्वाधिक रक्षक है। (यः) = जिसको (गावः) = ज्ञानेन्द्रियाँ (आसभिः) = [असनम्=आसः] शत्रुओं के काम-क्रोधादि के प्रक्षेपण के हेतु से (दधुः) = धारण करती हैं । जितना जितना मनुष्य ज्ञान-प्राप्ति में प्रवृत्त होता है, उतना उतना ही सोम-रक्षण सम्भव होता है और मनुष्य वासनाओं के विनाश व दूर फेंकने में समर्थ होता है। ज्ञान-प्राप्ति एक ऐसा व्यसन है जो अन्य सब व्यसनों को नष्ट कर देता है।

(च) = और (सूरयः) = विद्वान् विवेकी समझदार लोग (नूनम्) = शीघ्र ही [now, immediately] पुरा= आत्मरक्षा के लिए [for the defence of] दधुः = इस सोम को धारण करते हैं । वेद में 'पुरा' शब्द का अर्थ ‘रक्षा के लिए' होता है - यही अर्थ यहाँ सङ्गत है । विवेकशील पुरुष श्रेय और प्रेय का अन्तर समझकर सोम का विनियोग क्षणिक प्रेय के लिए न करके स्थायी श्रेय के लिए ही करता है और सोम की रक्षा में अत्यन्त सावधान हो जाता है। सोम की रक्षा यह 'ज्ञानेन्द्रियों के मुख' से ही कर पाता है, अर्थात् ज्ञानेन्द्रियों को सदा ज्ञान-प्राप्ति में लगाये रखकर ही सोम की रक्षा सम्भव होती है।
Essence
ज्ञानेन्द्रियों को ज्ञानप्राप्ति में लगाये रखकर ही हम सोम की रक्षा कर पाते हैं ।
Subject
ज्ञानेन्द्रियों के मुख से