Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1628

1875 Mantra
Devata- वायुः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
वा꣡यो꣢ शु꣣क्रो꣡ अ꣢यामि ते꣣ म꣢ध्वो꣣ अ꣢ग्रं꣣ दि꣡वि꣢ष्टिषु । आ꣡ या꣢हि꣣ सो꣡म꣢पीतये स्पा꣣र्हो꣡ दे꣢व नि꣣यु꣡त्व꣢ता ॥१६२८॥

वा꣡यो꣢꣯ । शु꣣क्रः꣢ । अ꣣यामि । ते । म꣡ध्वः꣢꣯ । अ꣡ग्र꣢꣯म् । दि꣡वि꣢꣯ष्टिषु । आ । या꣣हि । सो꣡म꣢꣯पीतये । सो꣡म꣢꣯ । पी꣣तये । स्पार्हः꣢ । दे꣣व । नियु꣡त्व꣢ता । नि꣣ । यु꣡त्व꣢꣯ता ॥१६२८॥

Mantra without Swara
वायो शुक्रो अयामि ते मध्वो अग्रं दिविष्टिषु । आ याहि सोमपीतये स्पार्हो देव नियुत्वता ॥

वायो । शुक्रः । अयामि । ते । मध्वः । अग्रम् । दिविष्टिषु । आ । याहि । सोमपीतये । सोम । पीतये । स्पार्हः । देव । नियुत्वता । नि । युत्वता ॥१६२८॥

Samveda - Mantra Number : 1628
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 17; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
जिस समय वेद में 'इन्द्रवायू' का वर्णन होता है, उस समय अध्यात्म में 'इन्द्र' का अभिप्राय ‘जीवात्मा' से है जो इन्द्रियों का अधिष्ठाता है और 'वायु' से अभिप्राय 'प्राण' है जो जीवात्मा की उन्नति के लिए प्रभु द्वारा प्राप्त कराया गया है ।

प्राणसाधना से शरीर में शुक्र-वीर्य की ऊर्ध्वगति होती है, अतः यहाँ वायु को शुक्र ही कह दिया है। इस शुक्र की रक्षा से वीर्य की ऊर्ध्वगति होकर ज्ञानाग्नि दीप्त होती है और मनुष्य ज्ञान के शिखर तक पहुँच पाता है । ज्ञान का शिखर ही मधुविद्या है । यह मधुविद्या ही ब्रह्मविद्या है, अतः मन्त्र में कहते हैं कि (वायो) = हे प्राण ! (शुक्र:) = तू शुक्र है – वीर्य है, वीर्यरक्षा का मुख्य साधन है। (ते) = तेरे द्वारा मैं (दिविष्टिषु) = ज्ञान-यज्ञों में [दिव् इष्टि] (मध्वः अग्रम्) = मधुविद्या के शिखर पर (अयामि) = पहुँचता हूँ।

यह वायु अथवा प्राण (स्पार्हः) = स्पृहणीय है - इससे अधिक मधुर व चाहने योग्य कोई वस्तु नहीं है। प्राण की आकांक्षा करता हुआ प्रत्येक व्यक्ति यही चाहता है कि “मा न भूवं, भूयासम्'=न होऊँ यह बात न हो— बना ही रहूँ । यह 'देव' है – दिव्य गुणों को प्राप्त करानेवाला है, अतः मन्त्र में कहते हैं कि हे (देव) = दिव्य गुण-प्रापक वायो ! तू (स्पार्हः ) =स्पृहणीय है। आप (सोमपीतये) = सोमपान के लिए (नियुत्वता) = स्तोता के साथ अथवा प्रशस्त इन्द्रियरूप घोड़ोंवालों के साथ (आयाहि) = हमारे इस जीवन-यज्ञ में आओ ।

प्राण-साधना से ही सोमपान - वीर्यरक्षा होती है । वीर्यरक्षा से ही दीप्त ज्ञानाग्निवाले होकर हम मधुविद्या व ब्रह्मविद्या के शिखर पर पहुँचते हैं। प्राणसाधना करनेवाला व्यक्ति प्रशस्तेन्द्रियाश्वोंवाला प्रभु का स्तोता गोतम होता है । यह उत्तम दिव्य गुणोंवाला बनने से 'वामदेव' कहलाता है।
Essence
हम प्राणसाधना पर बल दें । यही हमें शिखर पर पहुँचाएगी।
Subject
मधुविद्या के शिखर पर