Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1625

1875 Mantra
Devata- विष्णुः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
कि꣡मित्ते꣢꣯ विष्णो परि꣣च꣢क्षि꣣ ना꣢म꣣ प्र꣡ यद्व꣢꣯व꣣क्षे꣡ शि꣢पिवि꣣ष्टो꣡ अ꣢स्मि । मा꣡ वर्पो꣢꣯ अ꣣स्म꣡दप꣢꣯ गूह ए꣣त꣢꣫द्यद꣣न्य꣡रू꣢पः समि꣣थे꣢ ब꣣भू꣡थ꣢ ॥१६२५॥

कि꣢म् । इत् । ते꣣ । विष्णो । परिच꣡क्षि꣢ । प꣣रि । च꣡क्षि꣢꣯ । ना꣡म꣢꣯ । प्र । यत् । व꣡वक्षे꣢꣯ । शि꣡पिविष्टः꣢ । शि꣢पि । विष्टः꣢ । अ꣣स्मि । मा꣡ । व꣡र्पः꣢꣯ । अ꣣स्म꣢त् । अ꣡प꣢꣯ । गू꣣हः । एत꣢त् । यत् । अ꣣न्य꣡रू꣢पः । अ꣣न्य꣢ । रू꣣पः । समिथे꣢ । स꣣म् । इथे꣢ । ब꣣भू꣡थ꣢ ॥१६२५॥

Mantra without Swara
किमित्ते विष्णो परिचक्षि नाम प्र यद्ववक्षे शिपिविष्टो अस्मि । मा वर्पो अस्मदप गूह एतद्यदन्यरूपः समिथे बभूथ ॥

किम् । इत् । ते । विष्णो । परिचक्षि । परि । चक्षि । नाम । प्र । यत् । ववक्षे । शिपिविष्टः । शिपि । विष्टः । अस्मि । मा । वर्पः । अस्मत् । अप । गूहः । एतत् । यत् । अन्यरूपः । अन्य । रूपः । समिथे । सम् । इथे । बभूथ ॥१६२५॥

Samveda - Mantra Number : 1625
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 17; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (विष्णो) = सर्वव्यापक व निराकार प्रभो ! ते तुझे (किम् नाम इत्) = किस नाम से (परिचक्षि) = सम्बोधित करूँ ? [परिचक्ष् to address]। निराकार का नाम भी क्या रक्खूँ? और किस नाम से बुलाऊँ ?

अच्छा, उसी नाम से ही बुलाऊँ (यत्) = जिस नाम से आप अपने को (प्रववक्षे) = प्रकर्षेण बारम्बार कहते हैं कि मैं (शिपिविष्ट:) = किरणों से व्याप्त [ शिपि - किरण, विष् to pervade] (अस्मि) = हूँ । वस्तुतः वे प्रभु प्रकाश - ही - प्रकाश हैं - प्रकाश की किरणों से व्याप्त । वे प्रभु तो तेज-ही-तेज हैं । प्रभु हज़ारों सूर्यों के तेज के समान हैं। ('तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमम्') = इस ईशोपनिषद् के मन्त्र में प्रभु के तेजस्वी रूप का ही प्रतिपादन है । वेद में अन्यत्र प्रभु को 'आदित्यवर्णम्' कहा है ।

हे प्रभो ! आप (अस्मत्) = हमसे (एतत् वर्पः) = इस तेजस्वी रूप को (मा अपगूह) = संवृत मत कीजिए । आपका यह तेजस्वीरूप हमारी आँखों से प्रकृतिरूप हिरण्मय पात्र के द्वारा ओझल हुआ-हुआ है। आप इस आवरण को हटाइए और अपने सत्यस्वरूप का हमें दर्शन कराइए ।

आपका दर्शन मेरे लिए इसलिए आवश्यक है कि (यत्) = आप (समिथे) = वासनाओं के साथ होनेवाले संग्राम में (अन्यरूप:) = विलक्षणरूपवाले बभूथ होते हैं। वासनाओं से संग्राम में आपका उग्ररूप ही तो हमारे उन शत्रुओं का नाश करनेवाला होता है। आपके बिना क्या कभी इन शत्रुओं को जीता जा सकता है ? आपका दर्शन मुझे ऐसी शक्ति प्राप्त कराता है कि मैं इन शत्रुओं को वश करने में समर्थ होकर इस मन्त्र का ऋषि वसिष्ठ='वशिष्ठ' बनता हूँ । 
Essence
हम प्रभु के तेजस्वी रूप को देखें और उस तेज में वासनाओं को भस्म करनेवाले हों।
 
Subject
प्रभु का वह विलक्षण तेजोमय रूप