Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1613

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- पर्वतनारदौ Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
स꣡ने꣢मि꣣ त्व꣢म꣣स्म꣡दा अदे꣢꣯वं꣣ कं꣡ चि꣢द꣣त्रि꣡ण꣢म् । सा꣣ह्वा꣡ꣳ इ꣢न्दो꣣ प꣢रि꣣ बा꣢धो꣣ अ꣡प꣢ द्व꣣यु꣢म् ॥१६१३॥

स꣡ने꣢꣯मि । त्वम् । अ꣣स्म꣢त् । आ । अ꣡दे꣢꣯वम् । अ । दे꣣वम् । क꣢म् । चि꣣त् । अत्रि꣡ण꣢म् । सा꣣ह्वा꣢न् । इ꣣न्दो । प꣡रि꣢꣯ । बा꣡धः꣢꣯ । अ꣡प꣢꣯ । द्व꣣यु꣢म् ॥१६१३॥

Mantra without Swara
सनेमि त्वमस्मदा अदेवं कं चिदत्रिणम् । साह्वाꣳ इन्दो परि बाधो अप द्वयुम् ॥

सनेमि । त्वम् । अस्मत् । आ । अदेवम् । अ । देवम् । कम् । चित् । अत्रिणम् । साह्वान् । इन्दो । परि । बाधः । अप । द्वयुम् ॥१६१३॥

Samveda - Mantra Number : 1613
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 16; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
‘सनेमि' शब्द के दो अर्थ हैं—'सनातन काल से' तथा 'शीघ्र' । जीव प्रभु से प्रार्थना करता है कि हे (इन्दो) = परमैश्वर्यवाले परम शक्तिशाली प्रभो ! (त्वम्) = आप (अस्मत्) = हमसे (सनेमि) = शीघ्र ही १. (अदेवम्) = देव-विरोधी भावना को, अर्थात् स्वार्थवश स्वयं सब-कुछ खा जाने की वृत्ति को (आसाह्वान्) = पूर्णरूप से पराभूत कर दीजिए । हमारा जीवन यज्ञमय हो– देव यज्ञप्रिय होते हैं । असुर

बिना यज्ञ किये सब कुछ स्वयं खा जाते हैं। हम असुर न बनें । २. (कंचित्) = किसी अवर्णनीय शक्तिवाले (अत्रिणम्) = हमें खा जानेवाले [अद्+तृन्] इस काम को भी (आसाह्वान्) = पूर्ण पराभूत कीजिए। हमारा जीवन ब्रह्मचर्यवृत्तिवाला हो । ३. (बाध:) = औरों की हिंसा करना, इस वृत्ति को (परि) = हमसे दूर कीजिए । हम अहिंसा वृत्तिवाले हों । ४. (द्वयुम्) = अन्दर कुछ और बाहर कुछ– इस दोपने को, असत्य की वृत्ति को भी (अप) = हमसे दूर भगाइए।

एवं, प्रभुकृपा से हम स्तेय, अब्रह्मचर्य, हिंसा व असत्य की वृत्तियों से दूर होकर अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अहिंसा व सत्य में प्रतिष्ठित होते हैं । यही तो पर्वत बनना है । ऐसा ही व्यक्ति 'नारद' हो सकता है ।
Essence
प्रभुकृपा से हममें यमों की प्रतिष्ठा हो ।
Subject
यमों का पालन