Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1602

1875 Mantra
Devata- अग्निर्हवींषि वा Rishi- हर्यतः प्रागाथः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
गा꣢व꣣ उ꣡प꣢ वदाव꣣टे꣢ म꣣ही꣢ य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ र꣣प्सु꣡दा꣢ । उ꣣भा꣡ कर्णा꣢꣯ हिर꣣ण्य꣡या꣢ ॥१६०२॥

गा꣡वः꣢꣯ । उ꣡प꣢꣯ । व꣣द । अवटे꣢ । म꣣ही꣡इति꣢ । य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ । र꣣प्सु꣡दा꣢ । र꣣प्सु꣢ । दा꣣ । उ꣡भा । क꣡र्णा꣢꣯ । हि꣣रण्य꣡या꣢ ॥१६०२॥

Mantra without Swara
गाव उप वदावटे मही यज्ञस्य रप्सुदा । उभा कर्णा हिरण्यया ॥

गावः । उप । वद । अवटे । महीइति । यज्ञस्य । रप्सुदा । रप्सु । दा । उभा । कर्णा । हिरण्यया ॥१६०२॥

Samveda - Mantra Number : 1602
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 16; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हृदयस्थ प्रभु से बात करने का प्रसङ्ग गत मन्त्र में था । उसी प्रसङ्ग में कहते हैं कि – हे प्रभो ! आप (अवटे) = हृदयाकाश में (गाव:) = वेदवाणियों का (उपवद) = समीपता से उच्चारण कीजिए। जो वाणियाँ (मही) = महनीय—अर्थ गौरववाली हैं, (यज्ञस्य रप्सुदा) = यज्ञों का उत्तम उपदेश देनेवाली है तथा (उभा कर्णा हिरण्यया) = दोनों कानों के लिए हित और रमणीय हैं ।
Essence
हृदयस्थ प्रभु हित रमणीय बात का उपदेश दे रहे हैं, हम ध्यान से सुनें । 
Subject
प्रभु बोलें और मैं सुनूँ
Footnote
नोट -व्याख्या ११७ संख्या पर देखिए ।