Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 160

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
सु꣣रूपकृत्नु꣢मू꣣त꣡ये꣢ सु꣣दु꣡घा꣢मिव गो꣣दु꣡हे꣢ । जु꣣हूम꣢सि꣣ द्य꣡वि꣢द्यवि ॥१६०॥

सु꣣रूपकृत्नुम् । सु꣣रूप । कृत्नु꣢म् । ऊ꣣त꣡ये꣢ । सु꣣दु꣡घा꣢म् । सु꣣ । दु꣡घा꣢꣯म् । इ꣣व गोदु꣡हे꣢ । गो꣣ । दु꣡हे꣢꣯ । जु꣣हूम꣡सि꣣ । द्य꣡वि꣢꣯द्यवि । द्य꣡वि꣢꣯ । द्य꣣वि ॥१६०॥

Mantra without Swara
सुरूपकृत्नुमूतये सुदुघामिव गोदुहे । जुहूमसि द्यविद्यवि ॥

सुरूपकृत्नुम् । सुरूप । कृत्नुम् । ऊतये । सुदुघाम् । सु । दुघाम् । इव गोदुहे । गो । दुहे । जुहूमसि । द्यविद्यवि । द्यवि । द्यवि ॥१६०॥

Samveda - Mantra Number : 160
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
पवित्र मधुर इच्छाओंवाला ('मधुच्छन्दा:) = सभी के प्रति अत्यन्त स्नेह की भावनावाला (‘वैश्वामित्रः') = इस मन्त्र का ऋषि है। यह कहता है कि हे प्रभो! (ऊतये) = अपनी रक्षा के लिए (द्यविद्यवि) = प्रतिदिन (जुहूमसि) = हम आपको पुकारते हैं। आप (सुरूपकृत्लुम्) = उत्तम रूपों के निर्माता हैं। आपके स्मरण व आराधना से शरीर नीरोग, मन विशाल और बुद्धि तीव्र होती है । शरीर, मन व बुद्धि तीनों ही सुरूप हो जाते हैं। इन सुरूप अङ्ग-प्रत्यङ्गों को प्राप्त करके हम (गोदुहे) = ग्वाले के रूपवाले आपके लिए (सुदुघाम् इव) = उत्तम दूही जानेवाली गौ के समान हो जाते हैं।

हम अपने मानव जीवन की रक्षा इसी प्रकार कर सकते हैं कि शरीर, मन व बुद्धि को सुन्दर बनाएँ, परन्तु इन्हें सुन्दर बनाना प्रभु - कृपा से ही सम्भव है। इन्हें सुन्दर बनाकर मनुष्य सुदुघा गौ के समान बन जाता है, जिस गौ का ग्वाला प्रभु ही होता है । वेद में ‘गौ’ मानव जीवन के साथ जोड़ - सी दी गई है। वह हमारी माता बन गई है। हमारी शारीरिक नीरोगता, मानस विशालता व बुद्धि- सूक्ष्मता का निर्माण करनेवाली यह गौ ही है। इस गौ के दुग्ध से प्रभु ने हमारे शरीर, मन व बुद्धि को सुन्दर बनाने की व्यवस्था की है। ‘करनेवाले प्रभु ही हैं, मैं कौन ?' इस भावना को जाग्रत् करनेवाला ही सुदुघा गौ के समान बना रहता है।
Essence
प्रभु गोपाल हैं, हम उनकी उत्तम गौएँ बनें ।
Subject
मैं उस ग्वाले की उत्तम गौ बनूँ