Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 16

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣢ति꣣ त्यं꣡ चारु꣢꣯मध्व꣣रं꣡ गो꣢पी꣣था꣢य꣣ प्र꣡ हू꣢यसे । म꣣रु꣡द्भि꣢रग्न꣣ आ꣡ ग꣢हि ॥१६॥

प्र꣡ति꣢꣯ । त्यम् । चा꣡रु꣢꣯म् । अ꣣ध्वर꣢म् । गो꣣पीथा꣡य꣢ । प्र । हू꣣यसे । मरु꣡द्भिः꣢ । अ꣣ग्ने । आ꣢ । ग꣣हि ॥१६॥

Mantra without Swara
प्रति त्यं चारुमध्वरं गोपीथाय प्र हूयसे । मरुद्भिरग्न आ गहि ॥

प्रति । त्यम् । चारुम् । अध्वरम् । गोपीथाय । प्र । हूयसे । मरुद्भिः । अग्ने । आ । गहि ॥१६॥

Samveda - Mantra Number : 16
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(त्यम्)=उस (चारुम्)=करने योग्य [चर गतौ] (अध्वरं प्रति)= हिंसारहित यज्ञ में (गोपीथाय)= इन्द्रियों की रक्षा के लिए [गाव इन्द्रियाणि, पीथं = पानम्] हे (अग्ने)= प्रभो! आप (प्रहूयसे)= हमसे पुकारे जाते हैं। मनुष्य का कर्तव्य है कि अपनी प्रत्येक इन्द्रिय से यज्ञ- उत्तम कर्मों का अनुष्ठान करे। इसी बात को मन्त्र का 'चारु' शब्द व्यक्त कर रहा है। हमारा कोई भी कार्य हिंसा की प्रवृत्तिवाला न हो। कार्य की श्रेष्ठता व यज्ञरूपता की यही कसौटी है। 'अ-ध्वर' =नहीं हिंसा। हमारे कार्य अधिक-से-अधिक प्राणियों का भला करनेवाले हों। प्रभु का स्मरण ही आसुर वृत्तियों के दूर करने का उपाय है। मन्त्र में उस प्रभु से प्रार्थना है कि हे प्रभो! (मरुद्भिः)=प्राणों के साथ (आगहि)= आओ, हमें प्राप्त होओ । इस प्रकार वेद का यह संकेत स्पष्ट है कि इन्द्रियों की रक्षा के लिए प्राणों की साधना ही उपाय है। हम प्राणों की साधना द्वारा इन्द्रियों का संयम कर यज्ञ को नष्ट न होने दें। प्राण साधना द्वारा इन्द्रिय संयम ही श्रेय - मार्ग है। बिरले धीरों में से एक होते हुए हम इस मन्त्र के ऋषि ‘मेधातिथि' बनें।
Essence
 हे मनुष्यो ! प्राणसाधना से जितेन्द्रिय बनकर जीवन को यज्ञमय बनाओ।
Subject
मैं यज्ञ करूँ, प्रभु रक्षक हों