Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1599

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣य꣡मु꣢ ते꣣ स꣡म꣢तसि क꣣पो꣡त꣢ इव गर्भ꣣धि꣢म् । व꣢च꣣स्त꣡च्चि꣢न्न ओहसे ॥१५९९॥

अ꣣य꣢म् । उ꣣ । ते । स꣡म् । अ꣣तसि । कपो꣡तः꣢ । इ꣣व । गर्भधि꣢म् । ग꣣र्भ । धि꣢म् । व꣡चः꣢꣯ । तत् । चि꣣त् । नः । ओहसे ॥१५९९॥

Mantra without Swara
अयमु ते समतसि कपोत इव गर्भधिम् । वचस्तच्चिन्न ओहसे ॥

अयम् । उ । ते । सम् । अतसि । कपोतः । इव । गर्भधिम् । गर्भ । धिम् । वचः । तत् । चित् । नः । ओहसे ॥१५९९॥

Samveda - Mantra Number : 1599
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 16; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१८३ संख्या पर इस मन्त्र का अर्थ इस प्रकार है (अयम् उ ते) = मैं निश्चय से अब आपका हूँ। आप भी मुझे (सम् अतसि) = अच्छी प्रकार होते हो । अब मैं (गर्भधिम्) = इस जन्म-मरण के आवर्तीवाले समुद्र को (इव) = उस व्यक्ति की भाँति कर लेता हूँ जिसने कि (कपोतः) = मस्तिष्क व ज्ञान को ही अपनी नाव बनाया है । हे प्रभो ! (नः) = हमें (तत् वच: चित्) =  वेदज्ञान के वचन भी तो (ओहसे) = आप ही प्राप्त कराते हो । 
Essence
ज्ञान-नौका से भवसागर को तैर कर हम सच्चे सुख का निर्माण करनेवाले 'शेप' बनें ।
Subject
ज्ञान-नौका से भवसागर को तैरना