Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1598

1875 Mantra
Devata- द्यावापृथिव्यौ Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
म꣣ही꣢ मि꣣त्र꣡स्य꣢ साधथ꣣स्त꣡र꣢न्ती꣣ पि꣡प्र꣢ती ऋ꣣त꣢म् । प꣡रि꣢ य꣣ज्ञं꣡ नि षे꣢꣯दथुः ॥१५९८॥

म꣣ही꣡इति꣢ । मि꣣त्र꣡स्य꣢ । मि꣣ । त्र꣡स्य꣢꣯ । सा꣣धथः । त꣡र꣢꣯न्तीइ꣡ति꣢ । पि꣡प्र꣢꣯ती꣣इ꣡ति꣢ । ऋ꣣त꣢म् । प꣡रि꣢꣯ । य꣣ज्ञ꣢म् । नि । से꣣दथुः ॥१५९८॥

Mantra without Swara
मही मित्रस्य साधथस्तरन्ती पिप्रती ऋतम् । परि यज्ञं नि षेदथुः ॥

महीइति । मित्रस्य । मि । त्रस्य । साधथः । तरन्तीइति । पिप्रतीइति । ऋतम् । परि । यज्ञम् । नि । सेदथुः ॥१५९८॥

Samveda - Mantra Number : 1598
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 16; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
द्युलोक व पृथिवीलोक का उपासक ‘मित्र' है १. यह ज्ञान व शरीर की दृढ़ता के द्वारा ‘प्रमीतेः त्रायते'=असमय की मृत्यु से अपने को बचाता है । २. ज्ञान के कारण ही यह 'संमिन्वानो द्रवति'इस संसार में प्रत्येक क्रिया को माप-तोल कर करता है तथा ३. इस मेदिनी - पृथिवी के सम्पर्क में आकर ‘मेदयते' सबके साथ स्नेह करता है, यह सम्पूर्ण पृथिवी का नागरिक बन जाता है, इसे सभी से प्रेम होता है ।

(मही) = ये महनीय द्युलोक व पृथिवीलोक (मित्रस्य) = इस मित्र की (साधथ:) = साधना को पूर्ण करते हैं । (तरन्ती) = ये उसे सब (विघ्न) = बाधाओं से पार करते हैं और (ऋतम् पिप्रती) = उसके अन्दर यज्ञ की भावना को भरते हैं ।

ये द्युलोक व पृथिवीलोक स्वयं भी तो (यज्ञं परिनिषेदथुः) = सर्वतः यज्ञ का आश्रय करते हैं । अपने उपासक के जीवन को भी ये यज्ञ की भावना से पूर्ण करते हैं ।
Essence
हम मित्र बनकर द्युलोक व पृथिवीलोक के सच्चे उपासक बनें । ज्ञान व दृढ़ता ही वे दो गुण हैं जो हमें सब विघ्न-बाधाओं से पार करेंगे।
Subject
मित्र की साधना