Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1595

1875 Mantra
Devata- विश्वे देवाः Rishi- ऋजिश्वा भारद्वाजः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣡प꣢ नः सू꣣न꣢वो꣣ गि꣡रः꣢ शृ꣣ण्व꣢न्त्व꣣मृ꣡त꣢स्य꣣ ये꣢ । सु꣣मृडीका꣡ भ꣢वन्तु नः ॥१५९५॥

उ꣡प꣢ । नः । सून꣡वः꣢ । गि꣡रः꣢ । शृ꣣ण्व꣡न्तु꣢ । अ꣣मृ꣡त꣢स्य । अ꣣ । मृ꣡त꣢꣯स्य । ये । सु꣣मृडीकाः꣢ । सु꣣ । मृडीकाः꣢ । भ꣣वन्तु । नः ॥१५९५॥

Mantra without Swara
उप नः सूनवो गिरः शृण्वन्त्वमृतस्य ये । सुमृडीका भवन्तु नः ॥

उप । नः । सूनवः । गिरः । शृण्वन्तु । अमृतस्य । अ । मृतस्य । ये । सुमृडीकाः । सु । मृडीकाः । भवन्तु । नः ॥१५९५॥

Samveda - Mantra Number : 1595
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 16; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(ये) = जो (अमृतस्य गिरः) = अमृतवाणी के (सूनवः) = प्रेरक हैं वे (नः) = हमारी प्रार्थनाओं को (उपशृण्वन्तु) = समीपता से सुनें और इस प्रकार (नः) = हमारे लिए (सुमृडीका:) = उत्तम सुख देनेवाले भवन्तु हों । प्रभु की वेदवाणी अमृत-वाणी है, ('न ममार न जीर्यति') = यह न कभी मरती है, न जीर्ण होती है। सृष्टि के प्रारम्भ में अग्नि, वायु, आदित्य व अङ्गिरा के हृदयों में प्रकाशित की जाती है और उनके द्वारा सर्वत्र इसका प्रचार होता है। प्रलय के प्रारम्भ में उसी प्रभुरूप कोश में यह फिर निहित हो जाती है। यह अजरामर वाणी जीव के हित के लिए सदा उपदिष्ट होती है।

हमारी यह कामना है कि इस वेदवाणी के उपदेष्टा लोग ध्यान से हमारी प्रार्थना को सुनें । हमारी प्रार्थना को सुनकर ये हमें उस वेदवाणी का श्रवण कराएँ तथा हमारा कल्याण सिद्ध करनेवाले हों ।

ये वेदोपदेष्टा उस सरल मार्ग का हमें उपदेश दें जो हमें ब्रह्म की ओर ले जाता है ('आर्जव ब्रह्माणः पदम्) = सरलता ही तो प्रभु का मार्ग है। इस सरल मार्ग पर चलकर हम प्रस्तुत मन्त्र के ऋषि ‘ऋजिष्वा’ बनें जो ऋजुता= सरल मार्ग से श्वयति=चलता है ।
Essence
अमृतवाणी के उपदेष्टाओं से सरल मार्ग का ज्ञान प्राप्त करके हम प्रभु की ओर चलें और अपने कल्याण को सिद्ध करें ।
Subject
‘अमृत वाणी' के उपदेष्टा