Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 159

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- इरिम्बिठिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣यं꣡ त꣢ इन्द्र꣣ सो꣢मो꣣ नि꣡पू꣢तो꣣ अ꣡धि꣢ ब꣣र्हि꣡षि꣢ । ए꣡ही꣢म꣣स्य꣢꣫ द्रवा꣣ पि꣡ब꣢ ॥१५९॥

अ꣣य꣢म् । ते꣣ । इन्द्र । सो꣡मः꣢꣯ । नि꣡पू꣢꣯तः । नि । पू꣣तः । अ꣡धि꣢꣯ । ब꣣र्हि꣡षि꣢ । आ । इ꣣हि । ईम् । अस्य꣢ । द्र꣡व꣢꣯ । पि꣡ब꣢꣯ ॥१५९॥

Mantra without Swara
अयं त इन्द्र सोमो निपूतो अधि बर्हिषि । एहीमस्य द्रवा पिब ॥

अयम् । ते । इन्द्र । सोमः । निपूतः । नि । पूतः । अधि । बर्हिषि । आ । इहि । ईम् । अस्य । द्रव । पिब ॥१५९॥

Samveda - Mantra Number : 159
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
इस मन्त्र का ऋषि ‘इरिम्बिठि काण्व' है। क्रतुमय है हृदय जिसका, कर्म-संकल्प भरे हुए हृदयवाला यह इरिम्बिठि काण्व - कण्वपुत्र अत्यन्त मेधावी तो है ही । कर्म-संकल्प से रहित व्यक्ति कभी उन्नति के पथ पर आगे नहीं बढ़ सकता। यह क्रियाशीलता ही इस इरिम्बिठि की उन्नति का कारण बनती है। (क्रमशः) = उन्नति-पथ पर बढ़ता हुआ यह समय आने पर उन्नति-शिखर पर आरूढ़ होता है। इस उन्नति - शिखर पर पहुँचकर भी यदि यह सोम-विनीत बना रहता है तो यह कह सकता है कि हे इन्द्र = परमैश्वर्यशाली प्रभो! (अयं सोम:)=उन्नति होने पर भी विनीत बना हुआ यह मैं (ते) = तेरा ही हूँ। वस्तुतः जो व्यक्ति उन्नत होने पर गर्ववाला हो जाता है, वह अपने को ईश्वर [ईश्वरोऽहम् ] मानने लगता है, वह ईश्वर का भक्त नहीं रहता। यह गर्व ही अन्त में उसके पतन का कारण बनता है।

यह इरिम्बिठि प्रभु से कहता है कि (निपूत:) = मैंने अपने को नितरां पवित्र किया है, वस्त्रों व बाह्य शरीर के दृष्टिकोण से नहीं, अपितु (अधिबर्हिषि) = हृदय के दृष्टिकोण से। मैंने अपने हृदय से काम, क्रोध, लोभ आदि वासनाओं को दूर किया है और इस प्रकार अपने हृदय को निर्मल बनाया है, क्योंकि इसमें से वासनारूपी घास को उखाड़ दिया है, अतः यह सचमुच ‘बर्हिः' कहलाने योग्य हुआ है। इस प्रकार पवित्र बनकर मैं सचमुच आपका ही हो गया हूँ। (एहि) = आइए (ईम्) = निश्चय से आइए । (अस्य) = इस आपके भक्त के प्रति (द्रव) = अनुकम्पित हृदयवाले होओ और पिब इसकी रक्षा कीजिए । (पिब) = का सामान्य अर्थ पीना ही होता है,
परन्तु यहाँ ‘रक्षा करना' अर्थ अधिक सङ्गत है।
Essence
हम विनीत व पवित्रहृदय बनें, जिससे प्रभु - रक्षा के पात्र हों।
Subject
उन्नत होता हुआ भी विनीत