Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1588

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेध्यातिथिः काण्वः Chhand- बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्रो꣢ म꣣ह्ना꣡ रोद꣢꣯सी पप्रथ꣣च्छ꣢व꣣ इ꣢न्द्रः꣣ सू꣡र्य꣢मरोचयत् । इ꣡न्द्रे꣢ ह꣣ वि꣢श्वा꣣ भु꣡व꣢नानि येमिर꣣ इ꣡न्द्रे꣢ स्वा꣣ना꣢स꣣ इ꣡न्द꣢वः ॥१५८८॥

इ꣡न्द्रः꣢꣯ । म꣣ह्ना꣢ । रो꣡द꣢꣯सी꣣इ꣡ति꣢ । प꣣प्रथत् । श꣡वः꣢꣯ । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । सू꣡र्य꣢꣯म् । अ꣣रोचयत् । इ꣡न्द्रे꣢꣯ । ह꣢ । वि꣡श्वा꣢꣯ । भु꣡व꣢꣯नानि । ये꣣मिरे । इ꣡न्द्रे꣢꣯ । स्वा꣣ना꣡सः꣢ । इ꣡न्द꣢꣯वः ॥१५८८॥

Mantra without Swara
इन्द्रो मह्ना रोदसी पप्रथच्छव इन्द्रः सूर्यमरोचयत् । इन्द्रे ह विश्वा भुवनानि येमिर इन्द्रे स्वानास इन्दवः ॥

इन्द्रः । मह्ना । रोदसीइति । पप्रथत् । शवः । इन्द्रः । सूर्यम् । अरोचयत् । इन्द्रे । ह । विश्वा । भुवनानि । येमिरे । इन्द्रे । स्वानासः । इन्दवः ॥१५८८॥

Samveda - Mantra Number : 1588
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 16; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (इन्द्रः) = वे परमैश्वर्यशाली इन्द्र (मह्नाम्) = अपनी महिमा से (रोदसी) = द्युलोक व पृथिवीलोक में (शवः पप्रथत्) = अपने बल का विस्तार करते हैं । ब्रह्माण्ड के कण-कण में उस प्रभु की शक्ति कार्य करती हुई दृष्टिगोचर होती है।

२. (इन्द्रः) = वह प्रभु ही तो (सूर्यम्) = सूर्य को (अरोचयत्) = प्रकाशवाला कर रहा है। '(न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रदारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतो यमग्निः । तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति'') =  उस प्रभु को सूर्य, चन्द्र, तारे व विद्युत् प्रकाशित नहीं करते । इस अग्नि ने तो प्रकाशित करना ही क्या ? उसी की दीप्ति से ये सब दीप्त हो रहे हैं, वही इन सबको दीप्त कर रहा है । ३. (ह) = निश्चय से (इन्द्रे) = उस महान् नियामक, शासक प्रभु में ही विश्वा (भुवनानि) = सब लोक लोकान्तर (येमिरे) = नियमित हुए हैं। उसी की व्यवस्था में ये सब लोक चल रहे हैं। ४. (इन्द्रे) = उस शक्तिशाली प्रभु में (इन्दवः) = बड़े शक्तिशाली (स्वानासः) = शब्द हैं । इन शब्दों से ही उस प्रभु ने पृथक्-पृथक् संस्थाओं [सूर्य आदि आकृतियों] का निर्माण किया है। 
Essence
मेधातिथि=समझदार व्यक्ति वही है जो कण-कण में प्रभु की शक्ति का अनुभव करता है ।
 
Subject
शब्द से निर्माण