Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1585

1875 Mantra
Devata- वरुणः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣣मं꣡ मे꣢ वरुण श्रुधी꣣ ह꣡व꣢म꣣द्या꣡ च꣢ मृडय । त्वा꣡म꣢व꣣स्यु꣡रा च꣢꣯के ॥१५८५॥

इ꣣म꣢म् । मे꣣ । वरुण । श्रुधि । ह꣡व꣢꣯म् । अ꣣द्य꣢ । अ꣣ । द्य꣢ । च꣣ । मृडय । त्वा꣢म् । अ꣣वस्युः꣢ । आ । च꣣के ॥१५८५॥

Mantra without Swara
इमं मे वरुण श्रुधी हवमद्या च मृडय । त्वामवस्युरा चके ॥

इमम् । मे । वरुण । श्रुधि । हवम् । अद्य । अ । द्य । च । मृडय । त्वाम् । अवस्युः । आ । चके ॥१५८५॥

Samveda - Mantra Number : 1585
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 16; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (वरुण) = मेरे जीवन को श्रेष्ठ बनानेवाले प्रभो ! मे (इमं हवम् श्रुधि) = मेरी इस पुकार व प्रार्थना को आप सुनिए । (अद्य च) = और आज ही (मृडय) = मेरे जीवन को सुखी कीजिए । (अवस्युः) आत्मरक्षण चाहता हुआ मैं (त्वाम् आचके) = आपकी स्तुति करता हूँ [कै शब्दे] । 

उल्लिखित अर्थ में यह बात सुव्यक्त है कि यदि हम अपने जीवन को सुखी बनाना चाहते हैं तो प्रभु का सदा आवाहन करें । प्रभु की प्रार्थना हमारे जीवन-पथ को सुन्दर बनाकर हमें अवश्य सुखी करेगी ।

जब हम प्रभु का गायन करते हैं तब आसुरी वृत्तियाँ हमारे समीप फटकने नहीं पातीं। फलस्वरूप हमारा जीवन अपवित्र न होकर पवित्र, पवित्रतर व पवित्रतम होता जाता है और उसी अनुपात में वह सुखी भी होता जाता है। इस प्रकार सुख का निर्माण करनेवाले हम ‘शुन:शेप' होते हैं [शुन-सुख, शेप-निर्माण] ।
Essence
प्रभु वरुण हैं, सब बुराइयों का वारण करनेवाले हैं । उन्हीं की स्तुति हमारे अशुभ का निवारण कर हमें सुखी बनाएगी ।
Subject
वरुण का आवाहन