Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1570

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- प्रयोगो भार्गवः पावकोऽग्निर्बार्हस्पत्यो वा गृहपति0यविष्ठौ सहसः पुत्रावन्यतरो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣡प꣢ त्वा जा꣣म꣢यो꣣ गि꣢रो꣣ दे꣡दि꣢शतीर्हवि꣣ष्कृ꣡तः꣢ । वा꣣यो꣡रनी꣢꣯के अस्थिरन् ॥१५७०॥

उ꣡प꣢꣯ । त्वा꣣ । जाम꣡यः꣢ । गि꣡रः꣢꣯ । दे꣡दि꣢꣯शतीः । ह꣣विष्कृ꣡तः꣢ । ह꣣विः । कृ꣡तः꣢꣯ । वा꣣योः꣢ । अ꣡नी꣢꣯के । अ꣢स्थिरन् ॥१५७०॥

Mantra without Swara
उप त्वा जामयो गिरो देदिशतीर्हविष्कृतः । वायोरनीके अस्थिरन् ॥

उप । त्वा । जामयः । गिरः । देदिशतीः । हविष्कृतः । हविः । कृतः । वायोः । अनीके । अस्थिरन् ॥१५७०॥

Samveda - Mantra Number : 1570
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 15; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रस्तुत मन्त्र का व्याख्यान १३ संख्या पर इस प्रकार है

(हविष्कृतः) = दानपूर्वक अदन को अपना स्वभाव बना लेनेवाले पुरुष की (त्वा उप) = तेरे समीप (जामयः) = गति करनेवाली (देदिशती:) = निरन्तर तेरा निर्देश करती हुई (गिरः) = वाणियाँ भक्त को वायोः (अनीके) = वायु के समान शक्ति में (अस्थिरन्) = स्थिर करती हैं ।
Essence
हविष्कृत् भोगों का शिकार नहीं होता, अतः वायु के समान बलवाला होता है।
Subject
मारुति बनना