Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1569

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यो वीतहव्य आङ्गिरसो वा Chhand- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
वि꣣भू꣡ष꣢न्नग्न उ꣣भ꣢या꣣ꣳ अ꣡नु꣢ व्र꣣ता꣢ दू꣣तो꣢ दे꣣वा꣢ना꣣ꣳ र꣡ज꣢सी꣣ स꣡मी꣢यसे । य꣡त्ते꣢ धी꣣ति꣡ꣳ सु꣢म꣣ति꣡मा꣢वृणी꣣म꣡हेऽध꣢꣯ स्म नस्त्रि꣣व꣡रू꣢थः शि꣣वो꣡ भ꣢व ॥१५६९॥

विभू꣡ष꣢न् । वि꣣ । भू꣡ष꣢꣯न् । अ꣣ग्ने । उभ꣡या꣢न् । अ꣡नु꣢꣯ । व्र꣣ता꣢ । दू꣣तः꣢ । दे꣣वा꣡ना꣢म् । र꣡ज꣢꣯सी꣣इ꣡ति꣢ । सम् । ई꣣यसे । य꣢त् । ते꣣ । धीति꣢म् । सु꣡मति꣢म् । सु꣣ । मति꣢म् । आ꣣वृणीम꣡हे꣢ । आ꣣ । वृणीम꣡हे꣢ । अ꣡ध꣢꣯ । स्म꣣ । नः । त्रिव꣡रू꣢थः । त्रि꣣ । व꣡रु꣢꣯थः । शि꣣वः꣢ । भ꣣व ॥१५६९॥

Mantra without Swara
विभूषन्नग्न उभयाꣳ अनु व्रता दूतो देवानाꣳ रजसी समीयसे । यत्ते धीतिꣳ सुमतिमावृणीमहेऽध स्म नस्त्रिवरूथः शिवो भव ॥

विभूषन् । वि । भूषन् । अग्ने । उभयान् । अनु । व्रता । दूतः । देवानाम् । रजसीइति । सम् । ईयसे । यत् । ते । धीतिम् । सुमतिम् । सु । मतिम् । आवृणीमहे । आ । वृणीमहे । अध । स्म । नः । त्रिवरूथः । त्रि । वरुथः । शिवः । भव ॥१५६९॥

Samveda - Mantra Number : 1569
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 15; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (अग्ने) = सारे ब्रह्माण्ड को गति देनेवाले प्रभो ! (उभयान्) = दोनों (अनुव्रता) = अनुकूल व्रतोंवाले– वेदोपदिष्ट कर्मों को करनेवाले देवों व मनुष्यों को (विभूषन्) = विभूतियुक्त करते हुए तथा (देवानां दूतः) = देवताओं को कष्टाग्नि में सन्तप्त करके चमकानेवाले आप (रजसी) = द्युलोक व पृथिवीलोक में (समीयसे) = सम्यक् गति करते हैं।

सन्मार्ग में चलनेवाले सभी को प्रभु विभूति व ऐश्वर्य प्राप्त कराते हैं। विशेषकर दिव्य वृत्तिवालों को कष्टाग्नि में सन्तप्त कर खूब ही उज्ज्वल बना देते हैं । इस सारे द्युलोक व पृथिवीलोक में उस प्रभु की ही सारी क्रीड़ा हो रही है । वे प्रभु ही सबको दे रहे हैं ।

हे प्रभो ! (यत्) = जब (ते) = आपके (धीतिम्) = ध्यान को तथा (सुमतिम्) = कल्याणी मति को आवृणीमहे हम वरते हैं तो (अध) = अब आप (नः) = हमारे लिए (त्रिवरूथः) = तीन कवचोंवाले (शिवः) = कल्याणकारी (भव स्म) = अवश्य होओ । प्रभु के त्रिवरूथ से – तीन कवचों से - सुरक्षित होनेपर हमारे शरीर रोगों से, हमारे मन अशुभ वृत्तियों से तथा हमारी बुद्धियाँ कुण्ठता व कुविचार से आक्रान्त नहीं होते। नीरोग शरीर, शिव सङ्कल्प मन व तीव्र बुद्धिवाले होकर हम अपने सच्चे कल्याण का सम्पादन करते हैं। शरीर में हम भरद्वाज-शक्ति-सम्पन्न बनते हैं, मनों में हम वीतहव्य= पवित्र पदार्थों का ही प्रयोग करने की प्रवृत्तिवाले और मस्तिष्क में बार्हस्पत्य-ऊँचे-से-ऊँचा ज्ञानी होते हैं।
Essence
हम प्रभु के ध्यान व शुभ मति का वहन करें ।
Subject
[त्रि- वरूथ = कवचत्रयी ]
Footnote
नोट – यहाँ ‘उभयान्' शब्द सकाम व निष्काम कर्म करनेवाले मनुष्यों व देवों का वाचक है । सकाम कर्म करनेवाले स्वर्गादि के ऐश्वर्य का उपभोग करते हैं, निष्काम कर्मवाले सांसारिक भोगों से विरत होने से ब्रह्मानन्द का उपभोग करते हैं। इन्हें तीव्र कष्टों की परीक्षाओं से गुज़रना पड़ता है।