Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1566

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- गोपवन आत्रेयः Chhand- आनुष्टुभः प्रगाथः (गायत्री) Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प꣡न्या꣢ꣳसं जा꣣त꣡वे꣢दसं꣣ यो꣢ दे꣣व꣢ता꣣त्यु꣡द्य꣢ता । ह꣣व्या꣡न्यै꣢꣯रयद्दि꣣वि꣢ ॥१५६६॥

प꣡न्या꣢꣯ꣳसम् । जा꣣त꣡वे꣢दसम् । जा꣣त꣢ । वे꣣दसम् । यः꣢ । दे꣣व꣡ता꣢ति । उ꣡द्य꣢꣯ता । उत् । य꣣ता । हव्या꣡नि꣢ । ऐ꣡र꣢꣯यत् । दि꣣वि꣢ ॥१५६६॥

Mantra without Swara
पन्याꣳसं जातवेदसं यो देवतात्युद्यता । हव्यान्यैरयद्दिवि ॥

पन्याꣳसम् । जातवेदसम् । जात । वेदसम् । यः । देवताति । उद्यता । उत् । यता । हव्यानि । ऐरयत् । दिवि ॥१५६६॥

Samveda - Mantra Number : 1566
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 15; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(पन्यांसम्)=स्तुति के योग्य (जातवेदसम्) = प्रत्येक पदार्थ में विद्यमान अथवा सर्वज्ञ उस प्रभु का हम शंसन करते हैं (य:) = जो (देवताति उद्यता) = दिव्य गुणों के विस्तार में सदा उद्यत -  दिव्य गुणों की प्राप्ति के लिए सतत प्रयत्नशील (दिवि) = प्रकाश व ज्ञान से द्योतित पुरुष में (हव्यानि) = दानपूर्वक अदन के योग्य व पवित्र पदार्थों को (ऐरयत्) = प्राप्त कराते हैं।

नित्य अभियुक्त–योगमार्ग पर चलने के लिए सतत प्रयत्नशील पुरुषों को योगक्षेम प्राप्त करानेवाले वे प्रभु हैं। मनुष्य का कर्त्तव्य यह है कि वह दिव्य गुणों की प्राप्ति के लिए सदा प्रयत्नशील रहेखाना-पीना तो प्रभुकृपा से चलता ही है । इस प्रकाशमय मार्ग पर चलनेवाले व्यक्तियों के लिए 'हव्य' पदार्थों को प्रभु सदा प्राप्त कराते हैं । हव्य का अभिप्राय उन पवित्र पदार्थों से है जिनका अदन [भक्षण] सदा दानपूर्वक होता है। एवं, प्रभु का सच्चा भक्त जीवन-यात्रा में निर्धनता से पीड़ित नहीं होता।
Essence
हम सदा अपने अन्दर दिव्य-गुणों के विस्तार के लिए प्रयत्नशील हों।
Subject
योगक्षेमावह हरि