Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1558

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
सा꣣ह्वा꣡न्विश्वा꣢꣯ अभि꣣यु꣢जः꣣ क्र꣡तु꣢र्दे꣣वा꣢ना꣣म꣡मृ꣢क्तः । अ꣣ग्नि꣢स्तु꣣वि꣡श्र꣢वस्तमः ॥१५५८॥

साह्वा꣢न् । वि꣡श्वाः꣢꣯ । अ꣣भियु꣡जः꣢ । अ꣣भि । यु꣡जः꣢꣯ । क्र꣡तुः꣢꣯ । दे꣣वा꣡ना꣢म् । अ꣡मृ꣢꣯क्तः । अ । मृ꣣क्तः । अग्निः꣢ । तु꣣वि꣡श्र꣢वस्तमः । तु꣣वि꣢ । श्र꣣वस्तमः ॥१५५८॥

Mantra without Swara
साह्वान्विश्वा अभियुजः क्रतुर्देवानाममृक्तः । अग्निस्तुविश्रवस्तमः ॥

साह्वान् । विश्वाः । अभियुजः । अभि । युजः । क्रतुः । देवानाम् । अमृक्तः । अ । मृक्तः । अग्निः । तुविश्रवस्तमः । तुवि । श्रवस्तमः ॥१५५८॥

Samveda - Mantra Number : 1558
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 15; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
८. यह विश्वामित्र (विश्वा:) = न चाहते हुए भी हमारे अन्दर घुस आनेवाले (अभियुज:) = सब ओर से हमपर आक्रमण करनेवाले काम, क्रोध, लोभ आदि आसुरभावों को साह्वान्-पराभूत करनेवाला होता है।

९. (देवानां क्रतुः) = देवताओं के सङ्कल्पवाला होता है । सदा दिव्य गुणों को अपने अन्दर बढ़ाने की वृत्तिवाला होता है ।

१०. (अमृक्तः) = दिव्य गुणों के सतत सङ्कल्प के कारण ही यह आसुरवृत्तियों के आक्रमण से बचा [unhurt, safe] रहता है । 'प्रतिपक्षभावनम्'=आसुरवृत्तियों से बचने के लिए यह उनके प्रतिपक्ष – विरोधी दिव्य गुणों का सदा चिन्तन करता है।

११. (अग्निः) = दिव्य गुणों के चिन्तन के कारण वह सदा आगे और आगे बढ़ता चलता है इसका जीवन प्रगतिशील होता है और यह 

१२. (तुविश्रवस्तमः) = महान् श्रवस्- यशवाला [fame] होता है, महान् श्रवस्-धन-[wealth]-वाला होता है, महान् स्तोत्रों-[hymn]-वाला होता है तथा अत्यन्त श्रवस्- प्रशंसनीय कर्मोंवाला [praise wasthy action] होता है । यह कीर्ति, धन, स्तुति की वृत्ति तथा प्रशस्त कर्मोंवाला बनता है । 
Essence
हम भी अपने जीवनों में कीर्ति, धन, स्तुति तथा स्तुत्य कर्मोंवाले हों ।
Subject
तुवि-श्रवस्-तम