Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1556

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣡दा꣢भ्यः पुरए꣣ता꣢ वि꣣शा꣢म꣣ग्नि꣡र्मानु꣢꣯षीणाम् । तू꣢र्णी꣣ र꣢थः꣣ स꣢दा꣣ न꣡वः꣢ ॥१५५६॥

अ꣡दा꣢꣯भ्यः । अ । दा꣣भ्यः । पुरएता꣢ । पु꣣रः । एता꣢ । वि꣣शा꣢म् । अ꣣ग्निः꣢ । मा꣡नु꣢꣯षीणाम् । तू꣡र्णिः꣢꣯ । र꣡थः꣢꣯ । स꣡दा꣣ । न꣡वः꣢꣯ ॥१५५६॥

Mantra without Swara
अदाभ्यः पुरएता विशामग्निर्मानुषीणाम् । तूर्णी रथः सदा नवः ॥

अदाभ्यः । अ । दाभ्यः । पुरएता । पुरः । एता । विशाम् । अग्निः । मानुषीणाम् । तूर्णिः । रथः । सदा । नवः ॥१५५६॥

Samveda - Mantra Number : 1556
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 15; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
जिस भी व्यक्ति में प्रभु का निवास होता है उसका जीवन निम्न गुणों से युक्त हो जाता है (अदाभ्यः) = यह आसुर वृत्तियों से अहिंसनीय जीवनवाला होकर 'अदाभ्य' बन जाता है, ‘हिंसितुमयोग्य' हो जाता है।

२. (पुरः एता) = यह अपने जीवन में सदा आगे और आगे चलनेवाला होता है।

३. (मानुषीणां विशाम् अग्निः) = मननशील तथा मानव हितकारिणी प्रजाओं का यह प्रमुख होता है। इसका जीवन चिन्तनशील तो होता ही है साथ ही वह मानवमात्र का हित करने की वृत्तिवाला होता है, इसीलिए तो इसका नाम [विश्वामित्र] = सभी को मृत्यु व पाप से बचानेवाला तथा सभी के साथ स्नेह करनेवाला हो गया है । प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि यह [विश्वामित्र ] ही है । 

४. (तूर्णी रथः) = यह त्वरायुक्त रथवाला होता है । यह अपने शरीर को रथ समझता है और सब प्रकार से आलस्यशून्य होने के कारण यह तीव्र गति से अपनी यात्रा पर आगे और आगे बढ़ता चलता है। इसके जीवन में 'थकावट, तमोगुण, तन्द्रा व गपशप' का कोई स्थान नहीं है।

। ५. (सदा नवः) = [नू स्तुतौ] यह उठते-बैठते, सोते-जागते, खाते-पीते, श्वास-प्रश्वास लेते हुए भी सदा उस प्रभु का स्तवन करता है । प्रभु-स्मरण के साथ इसकी सम्पूर्ण क्रियाएँ चलती हैं इसी से यह निरभिमान बना रहता है । 'अहं और मम' से ऊपर उठ जाने से यह पुण्य-पाप व सुखदुःख से भी ऊपर उठ जाता है । यही जीव के विकास की चरम सीमा है ।
 
Essence
हम आसुरवृत्तियों से अहिंस्य बनकर ‘अदाभ्य' बनें। ‘अदाभ्य' बनने के लिए ही 'सदा नव' सदा प्रभु का स्तवन करनेवाले हों । 
Subject
अदाभ्य -सदा नव