Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 155

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः सुकक्षो वा आङ्गिरसः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
पा꣢न्त꣣मा꣢ वो꣣ अ꣡न्ध꣢स꣣ इ꣡न्द्र꣢म꣣भि꣡ प्र गा꣢꣯यत । वि꣣श्वासा꣡ह꣢ꣳ श꣣त꣡क्र꣢तुं꣣ म꣡ꣳहि꣢ष्ठं चर्षणी꣣ना꣢म् ॥१५५॥

पा꣡न्त꣢꣯म् । आ । वः꣣ । अ꣡न्ध꣢꣯सः । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । अ꣣भि꣢ । प्र । गा꣣यत । विश्वासा꣡ह꣢म् । वि꣣श्व । सा꣡ह꣢꣯म् । श꣣त꣡क्र꣢तुम् । श꣣त꣢ । क्र꣣तुम् । मँ꣡हि꣢꣯ष्ठम् । च꣣र्षणीना꣢म् ॥१५५॥

Mantra without Swara
पान्तमा वो अन्धस इन्द्रमभि प्र गायत । विश्वासाहꣳ शतक्रतुं मꣳहिष्ठं चर्षणीनाम् ॥

पान्तम् । आ । वः । अन्धसः । इन्द्रम् । अभि । प्र । गायत । विश्वासाहम् । विश्व । साहम् । शतक्रतुम् । शत । क्रतुम् । मँहिष्ठम् । चर्षणीनाम् ॥१५५॥

Samveda - Mantra Number : 155
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
पिछले मन्त्र में सौम्यता व शक्ति की याचना थी। इस शक्ति का सम्पादन बिना सोम [semen] = वीर्य की रक्षा के सम्भव नहीं, और सोम का रक्षण प्रभु-स्तवन के बिना असम्भव है। इसीलिए मन्त्र में कहते हैं कि (इन्द्रम्)=उस सर्वैश्यशाली प्रभु का (आ) = सर्वथा (अभिप्रागायत)=गान करो। उस प्रभु का जो (वः) = तुम्हारे (अन्धसः) = सोम की (पान्तम्) = रक्षा कर रहा है। अन्धस् शब्द ही सोम-रक्षा के महत्त्व का प्रतिपादन करता है कि यह 'आध्यायनीयं भवति' [यास्क] सब प्रकार से ध्यान करने योग्य होता है। हमारा सारा आहार-विहार इसी की रक्षा के दृष्टिकोण से होना चाहिए। हम उष्णवीर्य वस्तुओं को कभी न खाएँ और उत्तेजक व्यायामों को न करें। इनसे बढ़कर आवश्यक बात यह है कि हम प्रभु का स्तवन करें। हमारे हृदयों में प्रभु का वास होगा तो वासना का वहाँ उत्थान न होगा और परिणामतः हम अपनी शक्ति को सुरक्षित रख सकेंगे।

१.(विश्वासाहम्) = वे प्रभु सबका पराभव करनेवाले हैं। हम भी उस प्रभु के स्तवन से सोमरक्षा द्वारा शक्तिशाली बनकर सबका अभिभव करनेवाले बनेंगे, तब हम संसार के प्रलोभनों से अभिभूत न होंगे।

२.(शतक्रतुम्) = वे प्रभु अनन्त [शत अनन्त] उत्तम कर्मोंवाले हैं। उस प्रभु का स्तवन करते हुए हम भी वीर्यवान् बन सदा उत्तम कर्मों में लगे रहेंगे।

३. (चर्षणीनां मंहिष्ठम्) - वे प्रभु मनुष्यों के लिए दातृ-तम हैं। 'प्रभु ने क्या नहीं दिया?' उसने जीवों के हित के लिए अपने को ही दे डाला है [आत्म-दा] । वीर्यवान् पुरुष भी विलास की ओर न जाने के कारण अपनी आवश्यकताओं को कम रखता है और अधिक-से-अधिक लोकहित करता है ।

संक्षेप में प्रभु का स्तवन करनेवाला व्यक्ति १. सोमरक्षा के द्वारा शक्तिशाली बनता है। २. सब प्रलोभनों का अभिभव करने में समर्थ होता है। ३. सदा यज्ञादि उत्तम कर्मों में लगा रहता है। ४. अपनी आवश्यकताओं को कम रखता हुआ सदा दानशील होता है। यह सांसारिक भोगों व ऐश्वर्य को महत्त्व न देकर ज्ञान को महत्त्व देता है। ज्ञान ही उसका शरण होता है। इसी से उसका नाम 'श्रुत-कक्ष' हो गया है। ज्ञान से उत्तम कोई शरण है ही नहीं, अत: वह 'सु-कक्ष' है। भोगमार्ग की ओर न जाने से वह 'आङ्गिरस' = शक्तिशाली है।
Essence
प्रभु-स्तवन से वासना को दूर रखकर हम अपनी शक्ति की रक्षा करें। 
Subject
प्रभु-स्तवन से वासना का विनाश