Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1543

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विरूप आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
म꣣न्द्र꣡ꣳ होता꣢꣯रमृ꣣त्वि꣡जं꣢ चि꣣त्र꣡भा꣢नुं वि꣣भा꣡व꣢सुम् । अ꣣ग्नि꣡मी꣢डे꣣ स꣡ उ꣢ श्रवत् ॥१५४३॥

मन्द्र꣢म् । हो꣡ता꣢꣯रम् । ऋ꣣त्वि꣡ज꣢म् । चि꣣त्र꣡भा꣢नुम् । चि꣣त्र꣢ । भा꣣नुम् । विभा꣡व꣢सुम् । वि꣣भा꣢ । व꣣सुम् । अग्नि꣢म् । ई꣣डे । सः꣢ । उ꣣ । श्रवत् ॥१५४३॥

Mantra without Swara
मन्द्रꣳ होतारमृत्विजं चित्रभानुं विभावसुम् । अग्निमीडे स उ श्रवत् ॥

मन्द्रम् । होतारम् । ऋत्विजम् । चित्रभानुम् । चित्र । भानुम् । विभावसुम् । विभा । वसुम् । अग्निम् । ईडे । सः । उ । श्रवत् ॥१५४३॥

Samveda - Mantra Number : 1543
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 15; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
मैं (अग्निम्) = मेरे जीवन के पथ-प्रदर्शक प्रभु की (ईडे) = स्तुति करता हूँ, (सः) = वह प्रभु (उ) = निश्चय से (श्रवत्) = सुनते हैं। प्रभु से की गयी प्रार्थना व्यर्थ नहीं जाती, वहाँ हमारी पुकार अरण्यरोदन नहीं होतीं। मैं उस प्रभु को पुकारता हूँ जो
१. (मन्द्रम्) = सदा आनन्दमय व आनन्दित करनेवाले हैं ।
२. (होतारम्) - जो संसार में जीव को उन्नति के सब साधन प्राप्त करानेवाले हैं। 
३. (ऋत्विजम्) = जो प्रत्येक समय पर उपासना के योग्य हैं। 
४. (चित्रभानुम्) = जो अद्भुत दीप्तिवाले हैं। 
५. (विभावसुम्) = जो ज्ञानरूप धनवाले हैं। 'ऋत्विजम्' शब्द का अर्थ ऋतु - ऋतु के अनुसार हमारे साथ भिन्न-भिन्न वस्तुओं का मेल करानेवाला भी है। प्रभु प्रत्येक ऋतु के योग्य वस्तुओं को हमें प्राप्त करनेवाले हैं। ऋतु के अनुसार ही सब आहार-विहार करनेवाला व्यक्ति इस मन्त्र का ऋषि विरूप-विशिष्टरूपवाला आङ्गिरस= शक्तिशाली बनता है ।
Essence
हम प्रभु के स्तोता बनकर सदा प्रसन्नचित्त रहने का प्रयत्न करें ।
 
Subject
वह प्रभु अवश्य सुनता है