Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1542

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विरूप आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣡प꣢ त्वा जु꣣ह्वो꣢३꣱म꣡म꣢ घृ꣣ता꣡ची꣢र्यन्तु हर्यत । अ꣡ग्ने꣢ ह꣣व्या꣡ जु꣢षस्व नः ॥१५४२॥

उ꣡प꣢꣯ । त्वा꣢ । जु꣢ह्वः । म꣡म꣢꣯ । घृ꣣ता꣡चीः꣢ । य꣣न्तु । हर्यत । अ꣡ग्ने꣢꣯ । ह꣣व्या꣢ । जु꣣षस्व । नः ॥१५४२॥

Mantra without Swara
उप त्वा जुह्वो३मम घृताचीर्यन्तु हर्यत । अग्ने हव्या जुषस्व नः ॥

उप । त्वा । जुह्वः । मम । घृताचीः । यन्तु । हर्यत । अग्ने । हव्या । जुषस्व । नः ॥१५४२॥

Samveda - Mantra Number : 1542
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 15; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (हर्यत) = सम्पूर्ण संसार को गति देनेवाले तथा सबका हित चाहनेवाले प्रभो ! (मम) = मेरी (घृताचीः) = [घृत+अञ्च] दीप्ति से युक्त (जुह्वः) = चित्तवृत्तियाँ अथवा वाणियाँ (त्वा उपयन्तु) = तुझे समीपता से प्राप्त हों, जिस प्रकार घृत भरे चम्मच अग्नि को प्राप्त होते हैं । 
हे (अग्ने) = मेरे जीवन को प्रकाशमय बनानेवाले प्रभो ! आप हमारी (हव्या) = पुकारों का (जुषस्व) = प्रेमपूर्वक सेवन करें, अर्थात् हमारी प्रार्थनाओं को सुनें ।

जो भी व्यक्ति अपनी चित्तवृत्ति को प्रभु-प्रवण करेगा वह अवश्य ही प्रभु का प्रिय बनेगा और प्रभु उसकी पुकार को सुनेंगे।
Essence
मैं प्रभु को चाहूँ, प्रभु को पुकारूँ।
Subject
मैं प्रभु को पुकारूँ, प्रभु मेरी पुकार सुनें