Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1541

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विरूप आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣡त्ते꣢ बृ꣣ह꣡न्तो꣢ अ꣣र्च꣡यः꣢ समिधा꣣न꣡स्य꣢ दीदिवः । अ꣡ग्ने꣢ शु꣣क्रा꣡स꣢ ईरते ॥१५४१॥

उ꣢त् । ते꣣ । बृह꣡न्तः꣢ । अ꣣र्च꣡यः꣢ । स꣣मिधा꣡न꣢स्य । स꣣म् । इधान꣡स्य꣢ । दी꣣दिवः । अ꣡ग्ने꣢꣯ । शु꣣क्रा꣡सः꣢ । ई꣣रते ॥१५४१॥

Mantra without Swara
उत्ते बृहन्तो अर्चयः समिधानस्य दीदिवः । अग्ने शुक्रास ईरते ॥

उत् । ते । बृहन्तः । अर्चयः । समिधानस्य । सम् । इधानस्य । दीदिवः । अग्ने । शुक्रासः । ईरते ॥१५४१॥

Samveda - Mantra Number : 1541
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 15; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (दीदिवः) = प्रकाशमान् प्रभो ! (समिधानस्य) = हृदयस्थली में समिद्ध किये जाते हुए हे (अग्ने) = अग्रेणी प्रभो ! (ते बृहन्तः) = तेरी वृद्धि की कारणभूत (शुक्रासः) = शुद्ध (अर्चयः) = ज्ञानदीप्तियाँ – ज्वालाएँ (उत् ईरते) =  उद्गत होती हैं ।

जब भक्त प्रकाशस्वरूप प्रभु को अपनी हृदय-स्थली में दीप्त करने में समर्थ होता है तब यह हृदय-स्थली ज्ञान की किरणों से जगमगा उठती है। वे ज्ञान की ज्वालाएँ शुद्ध होती हैं और हमारे जीवन की वृद्धि का साधन होती हैं । हृदय में इन ज्ञान ज्वालाओं के प्रकाशित होने पर उनका प्रतिक्षेप इस भक्त के चेहरे पर भी व्यक्त होता है । यह सामान्य पुरुषों से अधिक दीप्त-वदनवाला प्रतीत होता है, और विशिष्टरूपवाला होने के कारण मन्त्र का ऋषि ‘विरूप' है । यह अपने जीवन में एक विशेष शक्ति का अनुभव करता है और अङ्ग-प्रत्यङ्ग में शक्तिशाली होने के कारण ‘आङ्गिरस' होता है । यह चेहरे से ही 'ब्रह्मवित्'-सा लगने लगता है। 
Essence
हृदयों में विकसित ज्ञान की दीप्ति हमारे मुखों पर प्रतिफलित होकर हमें यथार्थ में 'विरूप' बनाये ।
Subject
ब्रह्म-दीप्ति से दीप्त 'विरूप'