Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1539

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वृ꣡षो꣢ अ꣣ग्निः꣡ समि꣢꣯ध्य꣣ते꣢ऽश्वो꣣ न꣡ दे꣢व꣣वा꣡ह꣢नः । त꣢ꣳ ह꣣वि꣡ष्म꣢न्त ईडते ॥१५३९॥

वृ꣡षा꣢꣯ । उ꣣ । अग्निः꣢ । सम् । इ꣣ध्यते । अ꣡श्वः꣢꣯ । न । दे꣣ववा꣡ह꣢नः । दे꣣व । वा꣡ह꣢꣯नः । तम् । ह꣣वि꣡ष्म꣢न्तः । ई꣣डते ॥१५३९॥

Mantra without Swara
वृषो अग्निः समिध्यतेऽश्वो न देववाहनः । तꣳ हविष्मन्त ईडते ॥

वृषा । उ । अग्निः । सम् । इध्यते । अश्वः । न । देववाहनः । देव । वाहनः । तम् । हविष्मन्तः । ईडते ॥१५३९॥

Samveda - Mantra Number : 1539
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 15; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(अग्निः) = वह अग्रस्थान में स्थित ‘परमेष्ठी प्रभु' (समिध्यते) = हमसे अपने हृदयों में समिद्ध किया जाता है। कौन-सा प्रभु ?

१. (वृष:) = जो सब कामनाओं का वर्षक है - सब मनोरथों का पूरक है ।

२. (अश्वः न) = जो हमारी जीवन-यात्रा के लिए अश्व के समान है, जिसको आधार बनाकर हम जीवन-यात्रा को पूर्ण कर सकते हैं ।

३. (देववाहनः) = जो देवों का वाहन है । जिस प्रभु को धारण करने से हम सब दिव्य गुणों को

प्राप्त कर पाते हैं। वह देव हममें देवताओं के साथ ही तो आते हैं 'देवो देवेभिरागमत्' । एवं, प्रभु की उपासना से १. हमारी कामनाएँ पूर्ण होती हैं । २. हमारी जीवन-यात्रा निर्विघ्नता से पूर्ण होकर हम लक्ष्यस्थान पर पहुँचनेवाले बनते हैं तथा ३. हमारे अन्दर दिव्य गुणों का विकास होता है ।

(तम्) = इस प्रभु की (हविष्मन्तः) = हविष्मान् लोग ही (ईडते) = उपासना करते हैं । हविष्मान् लोग वे हैं जो दानपूर्वक अदन- भक्षण करते हैं— जो यज्ञशेष खाते हैं । पञ्चयज्ञ करके बचे हुए का सेवन अमृत का सेवन है। ये अमृतसेवी ही उस प्रभु के सच्चे उपासक हैं । यही उस यज्ञरूप प्रभु की यज्ञ के द्वारा आराधना है ('यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः') । 
Essence
यज्ञमय जीवन के द्वारा यज्ञरूप प्रभु का हम यजन करें।
Subject
हविष्मान् ही उसका 'ईडन' करते हैं