Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1537

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य꣡जा꣢ नो मि꣣त्रा꣡वरु꣢꣯णा꣣ य꣡जा꣢ दे꣣वा꣢ꣳ ऋ꣣तं꣢ बृ꣣ह꣢त् । अ꣢ग्ने꣣ य꣢क्षि꣣ स्वं꣡ दम꣢꣯म् ॥१५३७॥

य꣢ज꣢꣯ । नः꣣ । मित्रा꣢ । मि꣣ । त्रा꣢ । व꣡रु꣢꣯णा । य꣡ज꣢꣯ । दे꣣वा꣢न् । ऋ꣣त꣢म् । बृ꣣ह꣢त् । अ꣡ग्ने꣢꣯ । य꣡क्षि꣢꣯ । स्वम् । द꣡म꣢꣯म् ॥१५३७॥

Mantra without Swara
यजा नो मित्रावरुणा यजा देवाꣳ ऋतं बृहत् । अग्ने यक्षि स्वं दमम् ॥

यज । नः । मित्रा । मि । त्रा । वरुणा । यज । देवान् । ऋतम् । बृहत् । अग्ने । यक्षि । स्वम् । दमम् ॥१५३७॥

Samveda - Mantra Number : 1537
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 15; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गोतम ‘राहूगण’ प्रभु से प्रार्थना करता है—१. हे (अग्ने) = मुझे आगे ले-चलनेवाले प्रभो! आप (नः) = हमारे साथ (मित्रावरुणौ) = प्राणापान को यज-सङ्गत कीजिए। मेरे प्राणापान ठीक कार्य करनेवाले होकर शरीर में ही सुरक्षित रहें ।

२. (देवान् यज) = हमारे साथ अन्य सब देवों को भी सङ्गत कीजिए। 'सूर्य-चन्द्रादि सभी देवता हमारे शरीर में निवास कर रहे हैं । ('सर्वा ह्यस्मिन् देवता गावो गोष्ठ इवासते') = इसमें सब देव उसी प्रकार रह रहे हैं जैसे गौशाला में गौएँ । इन सब देवों का यहाँ उत्तम निवास बना रहे ।

३. (बृहत् ऋतं यज) = हे प्रभो! आप वृद्धि की साधनभूत नियमितता [Strict regularity] को हमारे जीवनों के साथ जोड़िए । हमारा जीवन सूर्य और चन्द्रमा के समान बड़ी नियमित गति से चले। पूर्ण स्वास्थ्य का रहस्य इसी में तो है।

४. इस प्रकार ‘प्राणापान, अन्य देवों तथा नियमित जीवन [बृहत् ऋतम्] से युक्त करके हमें हे (अग्ने) = आगे ले-चल रहे प्रभो! (स्वं दमं यक्षि) = अपने घर से सङ्गत कीजिए- हम आपके मोक्षधाम को प्राप्त करनेवाले बनें । वस्तुतः यह ब्रह्मलोक ही जीव का वास्तविक घर है। आज प्राणापान की साधना करके, अन्य देवांशों को भी अपने साथ जोड़कर तथा बड़ा नियमित जीवन बिताकर वह अपने घर को फिर प्राप्त कर पाया है ।
Essence
हम फिर से अपने मोक्षधाम को प्राप्त करनेवाले बनें ।
Subject
मोक्षधाम की प्राप्ति