Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1532

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विरूप आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣ग्नि꣢र्मू꣣र्धा꣢ दि꣣वः꣢ क꣣कु꣡त्पतिः꣢꣯ पृथि꣣व्या꣢ अ꣣य꣢म् । अ꣣पा꣡ꣳ रेता꣢꣯ꣳसि जिन्वति ॥१५३२॥

अ꣣ग्निः꣢ । मू꣣र्धा꣢ । दि꣣वः꣢ । क꣣कु꣢त् । प꣡तिः꣢꣯ । पृ꣣थिव्याः꣢ । अ꣡य꣢म् । अ꣣पा꣢म् । रे꣡वा꣢꣯ꣳसि । जि꣢न्वति ॥१५३२॥

Mantra without Swara
अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम् । अपाꣳ रेताꣳसि जिन्वति ॥

अग्निः । मूर्धा । दिवः । ककुत् । पतिः । पृथिव्याः । अयम् । अपाम् । रेवाꣳसि । जिन्वति ॥१५३२॥

Samveda - Mantra Number : 1532
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
२७ संख्या पर इस मन्त्र का अर्थ इस प्रकार हैमन्त्र का ऋषि ‘विरूप'=विशिष्टरूपवाला ‘आङ्गिरस'=अङ्ग-प्रत्यङ्ग में रसवाला है। 'ऐसा क्यों ?' इसलिए कि वह -
१. (अग्निः) = आगे और आगे चलता है, २. (मूर्धा) = शिखर पर पहुँचता है, ३. (दिवः ककुत्) = ज्ञान के शिखर पर पहुँचनेवाला होता है, ४. (पृथिव्याः) = इस पार्थिव शरीर का (अयम्) = यह (पतिः) = पति = स्वामी होता है, अर्थात् जितेन्द्रिय होता है । यह ऐसा इसलिए बन पाया है कि (अपाम्) = जलों के सम्बन्धी (रेतांसि) = रेतस् की शक्ति को यह (जिन्वति) = अपने अन्दर प्रेरित करता है।
Essence
संयम द्वारा हम 'विरूप आङ्गिरस' बनें ।
Subject
विरूप आङ्गिरस