Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1530

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- केतुराग्नेयः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣢ग्ने꣣ न꣡क्ष꣢त्रम꣣ज꣢र꣣मा꣡ सूर्य꣢꣯ꣳ रोहयो दि꣣वि꣢ । द꣢ध꣣ज्ज्यो꣢ति꣣र्ज꣡ने꣢भ्यः ॥१५३०॥

अ꣡ग्ने꣢꣯ । न꣡क्ष꣢꣯त्रम् । अ꣣ज꣡र꣢म् । अ꣣ । ज꣡र꣢꣯म् । आ । सू꣡र्य꣢꣯म् । रो꣣हयः । दि꣣वि꣢ । द꣡ध꣢꣯त् । ज्यो꣡तिः꣢꣯ । ज꣡ने꣢꣯भ्यः ॥१५३०॥

Mantra without Swara
अग्ने नक्षत्रमजरमा सूर्यꣳ रोहयो दिवि । दधज्ज्योतिर्जनेभ्यः ॥

अग्ने । नक्षत्रम् । अजरम् । अ । जरम् । आ । सूर्यम् । रोहयः । दिवि । दधत् । ज्योतिः । जनेभ्यः ॥१५३०॥

Samveda - Mantra Number : 1530
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(अग्ने) = हे प्रकाश के केन्द्र प्रभो! आपने (जनेभ्यः) = लोकों के लिए (ज्योतिः दधत्) = प्रकाश को धारण करने के हेतु से (अजरम्) = न जीर्ण होनेवाले (नक्षत्रम्) = [नक्ष गतौ] सतत गमनशील (सूर्यम्) = सूर्य को (दिवि) = द्युलोक में (आरोहयः) = स्थापित किया है ।

वैज्ञानिक लोगों की कल्पना है कि – सूर्य से लाखों टन प्रकाश पृथिवी पर प्रतिदिन पड़ रहा है और इस क्रम से कुछ वर्षों में सूर्य समाप्त हो जाएगा और एक बुझा कोयलामात्र रह जाएगा। वेद इस भ्रम को दूर करता हुआ कह रहा है कि यह 'अजर' ज्योति है, जीर्ण होनेवाली नहीं । प्रभु की अद्भुत प्राकृतिक व्यवस्था के द्वारा सूर्य का क्षय व पुनः पूरण ठीक प्रकार से चल रहा है। ‘सूर्य ठहरा हुआ है' इस भ्रम का निवारण 'नक्षत्र' शब्द से हो रहा है – सूर्य ठहरा नहीं, अपितु सतत गमनशील है।

प्रभु ने लोक-लोकान्तरों को प्रकाशित करने के लिए सूर्य को द्युलोक में स्थापित किया है । द्युलोकस्थ देवताओं का मुखिया यह सूर्य सभी देवों का अग्रणी है, चन्द्र इत्यादि पिण्ड सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित होते हैं, परन्तु यह सूर्य भी स्वयं भासमान थोड़े ही है। यह भी उस प्रभु की ही दीप्ति से दीप्त हो रहा है । 'तस्य भासा सर्वमिदं विभाति'। 'केतु' इस सूर्य की दीप्ति को देखकर प्रभु की दीप्ति की कल्पना करता है । इस सूर्य में वह प्रभु की महिमा को देखता है और इस प्रकार उसका मस्तिष्क प्रभु की महत्ता से भर जाता है और यह प्रभु-भक्त बन जाता है। प्रभु का यह ज्ञानीभक्त प्रभु को स्वभावतः प्रिय होता है ।
Essence
हम सूर्य को देखें । सूर्य की ज्योति में प्रभु की महिमा को देखें । 
Subject
सूर्य का भी सूर्य