Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1526

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣡ नो꣢ अग्ने सुचे꣣तु꣡ना꣢ र꣣यिं꣢ वि꣣श्वा꣡यु꣢पोषसम् । मा꣣र्डीकं꣡ धे꣢हि जी꣣व꣡से꣢ ॥१५२६॥

आ । नः꣣ । अग्ने । सुचेतु꣡ना꣢ । सु꣣ । चेतु꣡ना꣢ । र꣣यि꣢म् । वि꣣श्वा꣢यु꣢पोषसम् । वि꣣श्वा꣢यु꣢ । पो꣣षसम् । मार्डीक꣢म् । धे꣣हि । जीव꣢से꣢ ॥१५२६॥

Mantra without Swara
आ नो अग्ने सुचेतुना रयिं विश्वायुपोषसम् । मार्डीकं धेहि जीवसे ॥

आ । नः । अग्ने । सुचेतुना । सु । चेतुना । रयिम् । विश्वायुपोषसम् । विश्वायु । पोषसम् । मार्डीकम् । धेहि । जीवसे ॥१५२६॥

Samveda - Mantra Number : 1526
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (अग्ने) = प्रकाश प्राप्त करानेवाले प्रभो ! (नः) = हमें सुचेतुना उत्तम ज्ञान के साथ अथवा उत्तम ज्ञान के द्वारा (विश्व-आयु-पोषसम्) = सब मनुष्यों का पोषण करनेवाले नकि केवल हमारा ही पोषण करनेवाले (मार्डीकम्) = सुख के साधनभूत (रयिम्) = धन को (जीवसे) = उत्तम जीवन के लिए (आधेहि) = समन्तात् धारण कराइए ।

१. ज्ञानशून्य धन मनुष्य को विषयासक्त बनाता हैं, अतः हानिकर व अनुपादेय है। ज्ञानपूर्वक अर्जित धन ही ठीक है, उसके अभाव में हम by hook or by crook टेढ़े-मेढ़े सभी साधनों से धन कमाने लगते हैं । २. धन संविभागपूर्वक उपयुक्त होने पर अमृत तुल्य होता है और संविभाग के अभाव में हमें पापी बनाता है। ३. संविभक्त धन ही समाज की व्यवस्था को ठीक रखकर स्वस्थ समाज में हमारे जीवनों को सुखी करता है, अत: ऐसे ही धन की प्राप्ति के लिए यहाँ प्रभु से प्रार्थना की गयी है। वह धन हमें भोगासक्त न होने देकर प्रशस्तेन्द्रिय ‘गोतम' बनाता है । वही धन हमें त्याग की वृत्तिवाला 'राहूगण' बनाता है।
Essence
हम ज्ञानपूर्वक सुपथ से धनार्जन करें। हमारा धन केवल हमारा ही पोषण न करे । यह हमें सुखी करनेवाला हो ।
Subject
ज्ञान और धन