Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1523

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वसूयव आत्रेयाः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वी꣣ति꣡हो꣢त्रं त्वा कवे द्यु꣣म꣢न्त꣣ꣳ स꣡मि꣢धीमहि । अ꣡ग्ने꣢ बृ꣣ह꣡न्त꣢मध्व꣣रे꣢ ॥१५२३॥

वीति꣡हो꣢त्रम् । वी꣣ति꣢ । हो꣣त्रम् । त्वा । कवे । द्युम꣡न्त꣢म् । सम् । इ꣣धीमहि । अ꣡ग्ने꣢꣯ । बृ꣣ह꣡न्त꣢म् । अ꣣ध्वरे꣢ ॥१५२३॥

Mantra without Swara
वीतिहोत्रं त्वा कवे द्युमन्तꣳ समिधीमहि । अग्ने बृहन्तमध्वरे ॥

वीतिहोत्रम् । वीति । होत्रम् । त्वा । कवे । द्युमन्तम् । सम् । इधीमहि । अग्ने । बृहन्तम् । अध्वरे ॥१५२३॥

Samveda - Mantra Number : 1523
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (कवे) = [कौति सर्वा विद्याः] सृष्टि के प्रारम्भ में वेदवाणी द्वारा सब विद्याओं का उच्चारण करनेवाले प्रभो ! (द्युमन्तम्) = ज्ञान की दीप्तिवाले (वीतिहोत्रम्) = [वीति = प्रकाश, होत्रा वाणी] प्रकाशमय वाणीवाले (त्वा) = आपको (समिधीमहि) = हम अपने हृदयों में समिद्ध करते हैं । गत मन्त्र में ज्ञानियों के सम्पर्क में आकर प्रभु के प्रकाश को पाने का वर्णन था । वस्तुतः, हे (अने) = हमारी उन्नति के साधक प्रभो ! (बृहन्तम्) = सदावृद्ध आपको हम (अ-ध्वरे) = इस हिंसारहित जीवन-यज्ञ में समिद्ध करनेवाले बनें । इसी समिन्धन के लिए हमें सदा देवों का सम्पर्क प्राप्त होता रहे, उनके सम्पर्क में आकर प्रकाशमय वाणीवाले, ‘वीतिहोत्रं', आपकी वेदवाणी को हम सदा समझने में तत्पर रहें । इस वेदवाणी के अध्ययन का ही यह परिणाम होगा कि हम अपने जीवनों को 'अध्वर'=एक हिंसारहित यज्ञ का रूप दे पाएँगे और उन्नति के मार्ग पर बढ़ते हुए आपकी भाँति अपने हृदय को 'बृहत्'- विशाल बनाने का प्रयत्न करेंगे।
Essence
प्रभु कवि हैं, घुमान् हैं, उनकी वाणी प्रकाश व पवित्रता देनेवाली है। उस बृहत्=सदावृद्ध प्रभु को हम अपने हिंसारहित जीवन-यज्ञों में समिद्ध करने के लिए यत्नवान् हों।
Subject
हृदय की विशालता