Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1511

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- विश्वमना वैयश्वः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
न꣢ ह्या꣣꣬ꣳ३꣱ग꣢ पु꣣रा꣢ च꣣ न꣢ ज꣣ज्ञे꣢ वी꣣र꣡त꣢र꣣स्त्व꣢त् । न꣡ की꣢ रा꣣या꣢꣫ नैवथा꣣ न꣢ भ꣣न्द꣡ना꣢ ॥१५११॥

न । हि । अ꣣ङ्ग꣢ । पु꣣रा꣢ । च꣣ । न꣢ । ज꣣ज्ञे꣢ । वी꣣र꣡त꣢रः । त्वत् । न । किः꣣ । राया꣢ । न । ए꣣व꣡था꣢ । न । भ꣣न्द꣡ना꣢ ॥१५११॥

Mantra without Swara
न ह्याꣳ३ग पुरा च न जज्ञे वीरतरस्त्वत् । न की राया नैवथा न भन्दना ॥

न । हि । अङ्ग । पुरा । च । न । जज्ञे । वीरतरः । त्वत् । न । किः । राया । न । एवथा । न । भन्दना ॥१५११॥

Samveda - Mantra Number : 1511
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रभु ‘वैयश्व'=जितेन्द्रिय पुरुष से कहते हैं कि हे (अङ्ग) = गतिशील अतएव प्रिय ! (त्वत्) = तुझसे भिन्न (वीरतर:) = अधिक वीर (पुराचन) = पहले भी कभी (नहि) = निश्चय से नहीं (जज्ञे) = उत्पन्न हुआ है। जिस व्यक्ति ने इन्द्रियों को वश में किया है वह वीर तो है ही। सबसे अधिक वीरता इन इन्द्रियों के वशीकरण में ही तो है ।

प्रभु कहते हैं कि (न की राया) = न धन की दृष्टि से तेरे समान वीर हुआ है । 'राया' शब्द उस धन का संकेत करता है जो धन [ रा दाने] लोकहित के लिए दान किया जाता है। वे सैकड़ों हाथों से कमाते हैं और हज़ारों हाथों से दान देते हैं ।

(न एवथा) = न तेरे समान [एव = काम, अयन, अवन, नि० १२ | २१] उत्तम इच्छाओं से, न ही उत्तम गतियों—आचरणों से और न ही उत्तम प्रकार से रक्षणों के द्वारा कोई वीर हुआ है। तू 'शिवसंकल्प-शूर' है, तू कर्मशूर है और वासनाओं का वारण करनेवाला वीर है।

(न भन्दना) = [भन्दते अर्चतिकर्मा ३.१४ नि०, ज्वलतिकर्मा १.१६ नि०] - अर्चन के दृष्टिकोण से भी तेरे समान कोई वीर नहीं हुआ । तूने 'मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव, अतिथिदेवो भव'—[आत्मदेवो भव] = माता, पिता, आचार्य व अतिथि व प्रभु का पूजन करके सद् ज्ञान को प्राप्त किया है। उस ज्ञान से तेरा जीवन उज्ज्वल बना है। इस प्रकार अर्चन व दीपन के दृष्टिकोण से भी तुझसे अधिक कोई वीर नहीं हुआ। तेरी वीरता सचमुच अनुपम है— इसी से तू मुझे प्रिय है। 
Essence
हम दानवीर, संकल्पवीर, कर्मवीर, वासनानिवारण वीर तथा अर्चन व दीपन वीर बनें और प्रभु के प्रिय हों ।
Subject
वीर कौन है ?