Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 151

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः सुकक्षो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣ष्टा꣡ होत्रा꣢꣯ असृक्ष꣣ते꣡न्द्रं꣢ वृ꣣ध꣡न्तो꣢ अध्व꣣रे꣢ । अ꣡च्छा꣢वभृ꣣थ꣡मोज꣢꣯सा ॥१५१॥

इ꣣ष्टाः꣢ । हो꣡त्राः꣢꣯ । अ꣣सृक्षत । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । वृ꣣ध꣡न्तः꣢ । अ꣣ध्वरे꣢ । अ꣡च्छ꣢꣯ । अ꣣वभृथ꣢म् । अ꣣व । भृथ꣢म् । ओ꣡ज꣢꣯सा ॥१५१॥

Mantra without Swara
इष्टा होत्रा असृक्षतेन्द्रं वृधन्तो अध्वरे । अच्छावभृथमोजसा ॥

इष्टाः । होत्राः । असृक्षत । इन्द्रम् । वृधन्तः । अध्वरे । अच्छ । अवभृथम् । अव । भृथम् । ओजसा ॥१५१॥

Samveda - Mantra Number : 151
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(उत्तम यज्ञ) = 'हमारी इन्द्रियाँ सशक्त बन यज्ञों में प्रवृत्त हों' यह पिछले मन्त्र का सार था। इस मन्त्र में कहते हैं कि 'यज्ञों में निरन्तर प्रवृत्त हुई हुई वे इन्द्रियाँ आगे और आगे बढ़ती चलें और इसी जीवन में हमें यज्ञान्त स्नान करने के योग्य बनाएँ । '( इष्टाः होत्रा:) = वांछनीय यज्ञ (असृक्षत) = हमारे द्वारा निरन्तर किये जाएँ। कुछ यज्ञ ऐसे भी हैं जिन्हें हम अवांछनीय कह सकते हैं। अभिचार यज्ञ किसी के विनाश के लिए की जानेवाली हीन क्रियाएँ, इसी कोटि में आएँगे। सशक्त, संयमी जीवनवाला पुरुष उत्तम यज्ञों को ही करता है।

(इन्द्र-शक्ति का विकास) = इन (अध्वरे) = हिंसारहित यज्ञों में ये लोग (इन्द्रं वृधन्तः) = अपने में इन्द्र-शक्ति का विकास करते हुए (ओजसा) = ओजस्विता के साथ (अवभृथम्) = यज्ञान्त स्नान की (अच्छ) =ओर बढ़ते चलते हैं। हिंसारहित उत्तम यज्ञों से आत्मिक शक्ति का विकास होता है। इन यज्ञों का करनेवाला ओजस्वी बनता है। यह ओजस्विता इसे यज्ञमार्ग पर और अधिक आगे बढ़ने की योग्यता प्राप्त कराती है और इस प्रकार वह इन यज्ञों में ऐसी तीव्रता से आगे बढ़ता है कि इसी जन्म में उसके यज्ञान्त स्नान कर सकने की सम्भावना हो जाती है। जिस दिन वह यज्ञों को पूर्ण कर यज्ञमय बन जाएगा, इस दिन यह उस यज्ञरूप विष्णु की सचमुच यज्ञ के द्वारा उपासना करेगा। पातक=पाप जहाँ मनुष्य को ‘पातयन्ति'= गिराते हैं, वहाँ यज्ञ मनुष्य को उपर उठाते हैं। पापों से शक्ति घटती है, पुण्य से उसकी अभिवृद्धि होती है। एवं, यज्ञों से ओजस्वी बननेवाला पुरुष सचमुच 'आङ्गिरस' है- रसमय अङ्गोवाला है। प्रतिपादित को अपनी शरण बनानेवाला यह श्रुतकक्ष व सुकक्ष है।
Essence
हम इष्ट यज्ञों से आत्मिक शक्ति का विकास करें, और उससे यज्ञों की चरम सीमा तक पहुँचने के लिए प्रयत्नशील हों ।
Subject
यज्ञान्त स्नान की ओर